वसीयतनामा (लघुकथा)

“एक ही घर में अब एक साथ रहना बहुत मुश्किल है बाबूजी। मुझे अपना हक चाहिए।” बड़े बेटे राजेश ने अपनी बात रखी।

टीकेश्वर सिन्हा “गब्दीवाला”
घोटिया-बालोद (छत्तीसगढ़)
 

“आज तुम्हें क्या हुआ राजेश! पहले तो ऐसी बातें नहीं किया करते थे; और बेटे, एक साथ रहने में ही सबकी भलाई है।” बूढ़े व बीमार पिता गोपाल जी ने कहा- “देखो राजेश बेटे, तुम बड़े हो। समझदारी से काम लो बेटा। प्रेम, सहयोग व एकता से घर की उन्नति होती है।” लेकिन तुम्हें…?”

“लेकिन…. भैया ठीक ही कह रहे हैं बाबूजी।” गोपाल जी की आधी अधूरी बात पर छोटे बेटे सुजीत ने अकड़ते हुए कहा- “बाबूजी, अब एक साथ गुजारा सम्भव नहीं है। मैं भी उनके साथ नहीं रह सकता; चाहे तो आप मेरे साथ रह सकते हैं।”

“मेरे बेटे…!  वृक्ष से अलग होकर पत्तियाँ मुरझा जाती हैं। यह पेड़ के लिए भी दुखदाई होता है। सो,  मैं भी अपने जीते जी…” गोपाल जी आगे कुछ कह ही रहे थे, तभी राजेश कहने लगा- “ठीक है बाबूजी, पर आप अपना वसीयतनामा तो बना सकते हैं।”

“मुझे भी वसीयतनामा से कोई ऐतराज नहीं है।” सुजीत ने संतुष्टि जताई।

फिर अपने श्वेत केश पर उंगलियाँ फेरते हुए गोपाल जी बिस्तर से उठे; और राष्ट्रपिता बापू की तस्वीर को एकटक निहारते रहे।

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