भला-सामुक़द्दर न हो

ग़म  नहीं  गर  भला-सा मुक़द्दर न हो।
दिल के अन्दर मगर कोई भी डर न हो।

हमीद कानपुरी (अब्दुल हमीद इदरीसी)
सेवानिवृत वरिष्ठ प्रबन्धक,
पंजाब नेशनल बैंक, कानपुर

कितने ख़तरात हैं फायदा  कुछ नहीं,
सर खुला हो अगर सर पे चादर न हो।

बस यही है ख़ुदा से मेरी इल्तिज़ा,
हुक्मरां अब कोई भी सितमगर न हो।

क्या करे जा ब जा गर न घूमे कहीं,
पास जिसके ज़मी पर कोई घर न हो।

सच कहे कौन ज़ालिम के तब सामने,
मुल्क में गर कोई भी सुख़नवर न हो।

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5 thoughts on “भला-सामुक़द्दर न हो”

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