प्राचीन समय की बात है। एक गांव में चार मित्र रहते थे। चारों शिक्षा के लिए एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में गए। वहाँ रह कर उन चारों ने अन्य अनेक विद्याओं के साथ मृत संजीवनी विद्या भी सीखा। शिक्षा पूर्ण कर चारों खुशी और उत्साह से अपने गाँव के लिए चले। वे सोचते जा रहे थे उनके गाँव के लोगों को जब उनकी अद्भुत विद्याओं का पता चलेगा तो कितने खुश एवं आश्चर्यचकित होंगे। इसी तरह की बातें करते हुए वे चारों रास्ते में एक जंगल से गुजर रहे थे। अचानक उनकी नजर एक शेर के कंकाल पर पड़ी। उसे देख कर चारों ने अपनी सीखे गए विद्या, जिसे दिखा कर वे गाँव के लोगों को आश्चर्यचकित करने की सोच रहे थे, की परीक्षा करना चाहा। पहले मित्र ने शेर के कंकाल पर अपनी विद्या का प्रयोग कर मांस लगा दिया। दूसरे ने नस, रक्त आदि बना दिया। तीसरे ने उसके शरीर पर चमड़ी लगा दिया। अब वह कंकाल तुरंत का मरा हुआ शेर लग रहा था। उन्होने चौथे मित्र से उस मृत शेर में प्राण डालने के लिए कहा। लेकिन चौथे को इसके परिणाम की चिंता हुई। तीनों मित्र अपनी विद्या की सफलता के उत्साह में इतने मग्न हो गए थे कि परिणाम के बारे में सोच ही नहीं रहे थे। वे चौथे को उलाहना देने लगे कि उसे विद्या ठीक से नहीं आती, इसलिए वह शेर को जीवित नहीं कर रहा है। जब तीनों उसकी बात समझने के लिए तैयार नहीं हुए तब चौथे मित्र ने कहा तुम लोगों को अगर इसे जिंदा ही करना है तो पहले मुझे जाने दो, फिर कर लेना। यही हुआ। वह अपनी विद्या का प्रदर्शन किए बिना चला गया। उसके जाते ही तीनों मित्रों ने उस शेर को जिंदा कर दिया। शेर ने तीनों मित्रों को मार डाला।
यह कहानी बताती है कि पुस्तक से प्राप्त विद्या का प्रयोग भी सामान्य विवेक बुद्धि से ही किया जाना चाहिए। दूसरा बड़ा उदाहरण है रावण। उसे सभी शस्त्र और शास्त्रों का ज्ञान था। लेकिन उसके ज्ञान ने उसे अभिमानी बना दिया, उसे सही-गलत की पहचान नहीं रही। इसीलिए विद्वान होते हुए भी हजारों वर्षों से उसका पुतला दहन किया जाता है। जबकि शबरी अशिक्षित थी। उसे शास्त्रों का जो भी ज्ञान था, लोगों से सुन कर ही उसने अर्जित किया था। किन्तु अपने आचरण एवं सेवा भाव के कारण वह हमेशा आदर की पात्र रही।
लेकिन इन उदाहरणों का अर्थ यह नहीं कि शिक्षा या पुस्तक जरूरी नहीं। पढ़ना बहुत जरूरी है क्योंकि अपने आंतरिक एवं बाहरी जगत को जानने के लिए हमारी जिंदगी बहुत छोटी है, हमारी इंद्रियों की क्षमता सीमित है। पुस्तक दूसरों के अनुभवों और दृष्टिकोण को जानने का एक जरिया है। पुस्तकीय ज्ञान का उपयोग अपने सामान्य विवेक बुद्धि से करना चाहिए। दूसरी तरफ ‘पढ़ाई’ विचार का विस्तार कर सहज विवेक को प्रखर करता है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। इसीलिए हमारे यहाँ सरस्वती के साथ गणेश के पूजा करने की परंपरा है।
वास्तव में पुस्तक पढ़ना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही यह जानना कि क्या, कैसे, कब और कितना पढ़ना चाहिए? वर्तमान डिजिटल युग में यह चुनौतियाँ इन कारणों से और बढ़ी हैं: (1) लोगों के ध्यान को भटकाने के लिए गन्धर्वों एवं अप्सराओं से भी अधिक प्रभावी चीजें इंटरनेट पर उपलब्ध होती है। (2) 2 मिनट में मैगी, 10 मिनट में डेलीवरी, और 30-60 सेकंड वाले रील के समय में लोगों का मस्तिष्क एक स्थान पर केन्द्रित होना कठिन हो गया है। (3) इंटरनेट पर हम जो देखते-सुनते और सर्च करते हैं, वह हमें उससे मिलता-जुलता सामग्री ही दिखाता है। नए सृजनात्मक चीजें मिलनी कम हो जाती हैं। (4) अच्छी मार्केटिंग, विज्ञापन एवं ‘रीडर्स चॉइस’ जैसे रणनीति के कारण कई अच्छी रचनाएँ लोगों के नजरों में आने से बच जाती हैं। (5) किसी भी लेखक का अब कॉपीराइट सुरक्षित नहीं रह गया है। (6) एआई जैसी तकनीकी कुछ सेकेंड में ही तत्काल कहानी/कविता आदि लिख कर दे देती हैं। इन सबसे मूल एवं गंभीर लेखकों के लिए अनुचित प्रतियोगिता बढ़ जाती है। (7) प्रकाशकों के लिए मूल प्रति में छेड़छाड़ कर लेखक का नाम हटा कर और उसे उसके नाम एवं रॉयल्टी से वंचित कर देना अधिक आसान हो गया है। (8) स्व प्रकाशन ने सावधान सम्पादन खत्म कर एक प्रकार से भाषाई अराजकता ला दिया है।
पर डिजिटल माध्यम में इन समस्याओं के साथ-साथ चार बड़ी खूबियाँ भी हैं। (1) दुनिया भर की और विभिन्न भाषाओं की, सामग्री निःशुल्क या फिर बहुत कम शुल्क में उपलब्ध है, वह भी बिना समय या भूगोल की सीमा के। (2) लेखक और पाठक बिना किसी बाधा के आपस में संवाद कर सकते हैं। (3) प्रतिभाशाली लेखकों के लिए प्रकाशकों पर निर्भरता खत्म हो गई है। ब्लॉग एवं स्व प्रकाशन के विभिन्न माध्यमों द्वारा सीधे पाठकों तक पहुँचा जा सकता है, वह भी बहुत कम खर्च में। (4) पुस्तकों को अब ऑडियो, वीडियो माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है या फिर चित्रों और ग्राफिक्स के जरिये अधिक सरल एवं आकर्षक बनाया जा सकता है। इससे विभिन्न अभिरुचि के लोग अपनी सुविधा अनुसार इसे पढ़, देख या सुन सकते हैं।
निःसन्देह डिजिटल युग ने पुस्तकों की दुनिया को बहुत बदल दिया है, साथ ही पाठकों की रुचि को भी। इसका सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्ष है। बस जरूरत सावधानीपूर्वक सहज विवेक बुद्धि से इसे उपयोग करने की है। मस्तिष्क को दूषित करने वाले तत्त्वों की संख्या इतनी अधिक है कि स्वस्थ एवं प्रखर मस्तिष्क के लिए वर्तमान में पढ़ने की जरूरत और अधिक हो गयी है।

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