एक नदी में बहुत सी मछलियाँ रहती थीं। इनमें से तीन मछली आपस में बहुत अच्छी दोस्त थीं। तीनों के नाम थे दीर्घसूत्री, मध्यसूत्री, और आशुसूत्री। अपने नाम के अनुरूप ही तीनों के कार्य भी थे। आशुसूत्री निर्णय लेने में बहुत जल्दी करती थी। वह हमेशा समय रहते ही अपना काम कर लेती ही। लेकिन दीर्घसूत्री उसके बिल्कुल ही विपरीत कोई काम तब तक टालती रहती थी जब तक उसे करना बहुत जरूरी न हो जाए। मध्यसूत्री दोनों के बीच की थी। वह न बहुत देर करती न ही बहुत जल्दी।
एक बार की बात है। नदी में बाढ़ आई। पानी की मात्रा इतनी अधिक हो गई कि यह नदी से निकल कर बाहर गांवों, खेतों और खलिहानों में जाने लगा। पानी के साथ-साथ बहुत सी मछलियाँ भी बह कर चली गई। ये तीनों मित्र भी बाढ़ की पानी के साथ बह कर एक खेत में पहुँच गईं। पहले तो वह कुछ घबराई। फिर देखा वहाँ किसी चीज की कमी नहीं थी। खेतों में इतना पानी था कि वे आराम से रह सकती थीं। भोजन भी वहाँ पर्याप्त मात्रा में था। ये तीनों वहाँ सुख से रहने लगीं।
धीरे-धीरे बाढ़ का वेग कम होने लगा। पानी अब स्थिर होने लगा। आशुसूत्री ने कहा कि अब हमें अपने नदी में वापस चले जाना चाहिए। लेकिन उसकी दोनों मित्रों का कहना था अभी जाने की क्या जल्दी है। यहाँ इतना सारा पानी और भोजन तो है ही। वे कुछ दिन और रहना चाहती थीं। जब वे दोनों जाने के लिए तैयार नहीं हुई तो आशुसूत्री अकेली ही वापस नदी में चली गई। वह बड़े आराम से नदी में पहुँच गई।
कुछ दिनों के बाद पानी कम होने लगा। धूप से खेत का पानी गर्म होने लगा। अब मध्यसूत्री को भी चिंता हुई। उसने कहा ‘अब हमें वापस नदी में चलना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि रास्ते का पानी सूख जाए फिर हमारे लिए वापस जाना और मुश्किल हो जाएगा।’ लेकिन दीर्घसूत्री नहीं मानी। उसने कहा ‘अभी तो खेत में बहुत पानी है, जब पानी कम होने लगेगा तब चल चलेंगे।’ जब वह नहीं मानी तब मध्यसूत्री अकेली ही नदी के लिए चल पड़ी। रास्ते में पानी कम था, उसे थोड़ी तकलीफ हुई लेकिन सुरक्षित नदी तक पहुँचने में वह सफल रही।
कुछ दिन और बीते। अब गर्मी शुरू हो चुकी थी। खेत का पानी सूखने लगा। दीर्घसूत्री वापस जाने की सोची। लेकिन यह क्या! रास्ते का पानी अब सूख चुका था। सूखे कीचड़ से तैर कर वापस नदी में जाना संभव नहीं था। अब उसने महसूस किया कि वह खेत में कैद हो चुकी थी। इससे निकालना संभव नहीं था। उसे अफसोस होने लगा कि वह अपने मित्रों के साथ क्यों नहीं चली गई। गर्मी थोड़ी और बढ़ी। खेत का पानी पूरी तरह सूख गया। पानी के बिना दीर्घसूत्री तड़प कर मर गई। उस दिन से एक कहावत चल पड़ी ‘दीर्घसूत्री विंशयंती’ अर्थात दीर्घसूत्री का विनाश होता है।
वास्तव में जो कोई समय रहते भविष्य के लिए तैयारी कर लेता है उसकी परेशानी बहुत कम हो जाती है। चींटियाँ सर्दी और बरसात आने से पहले ही अपने घर में भोजन एकत्र कर लेती हैं और मौसम की मार से बच जाती हैं।
हम इंसान भी कोशिश करते हैं एक अच्छे जीवन के लिए योजना बनाने की। इसलिए तो बच्चों को पढ़ाते हैं ताकि उनका प्रौढ़ावस्था आसान हो सके। किन्तु जितनी तैयारी हम युवावस्था और प्रौढ़ावस्था के लिए करते हैं उतनी वृद्धावस्था के लिए नहीं। वास्तव में वृद्धावस्था की जरूरतें और क्षमताएँ जीवन की अन्य अवस्थाओं से अलग होती हैं। इसलिए तैयारी भी थोड़ी अलग और विशेष होनी चाहिए। कई लोग वृद्धवस्था के लिए आर्थिक तैयारी करते हैं पर सम्पूर्ण तैयारी को नजरअंदाज कर देते हैं।
क्या होना चाहिए हमारी वृद्धावस्था के लिए तैयारी? इसी विषय पर पत्रिका का यह अंक केन्द्रित है। आशा है अन्य अंकों की तरह यह अंक भी आपलोगों को पसंद आएगा। अपनी प्रतिक्रिया और सुझावों से हमे अवश्य अवगत कराएं। धन्यवाद।
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