तिथियों वाला कैलेंडर (लघुकथा)

प्रो. (डॉ.) योगेन्द्र नाथ शुक्ल (पूर्व प्राचार्य), सुदामा नगर, ए सेक्टर, अन्नपूर्णा मार्ग, इंदौर, मध्य प्रदेश

“गुड़ी पड़वा” के दिन तिथियों वाला हिंदी कैलेंडर खुशी से फूला नहीं समा रहा था। वह कभी दाएं डोल रहा था तो कभी बाएं…! दूसरी दीवार पर टंगे अंग्रेजी कैलेंडर को उसकी खुशी फूटी आंखों नहीं सुहा रही थी।

       “ए मिस्टर… तुम ज्यादा मत खुश हो! मेरे व्यक्तित्व के सामने तुम्हारा क्या अस्तित्व? जैसा मेरे नए साल का जश्न लोग मनाते हैं… क्या तुम्हारा वैसा मनाया जाता है…? बोलो…!”

       उसकी बात सुनकर उसका इधर-उधर डोलना बंद हो गया। यह देख कर अंग्रेजी कैलेंडर खुश होकर फड़फड़ाने लगा।

      “अब बोलती क्यों बंद हो गई? सुनो! मेरे पास अंक है अंक… और अंक को ही आज पूजा जा रहा है।”

“भाई, तुम भूल गए कि अंको से पहले शून्य आता है, जिसकी खोज हमारे यहां हुई। मेरी तिथियों की गणना से ही सारे त्यौहार मनाए जाते हैं। कोई भी शुभ काम हो… चाहे वह गृह प्रवेश हो या विवाह…! मुझे देखकर ही किया जाता है, तुम्हें देखकर नहीं! मेरे भाई…. तुम तो सिर्फ देखने भर के हो!”

    अंग्रेजी कैलेंडर दीवार से चिपक कर स्थिर हो गया और तिथियों वाला कैलेंडर फिर से दाएं… बाएं डोलने लगा।

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