ढोला–मारू (लोककथा)

साकार श्रीवास्तव ‘फ़लक’ उत्तर प्रदेश
(वरिष्ठ कवि, साहित्यकार।)

आत्मकथ्य- राजस्थान का इतिहास प्रेम, भक्ति, त्याग, शौर्य और बलिदान की गाथाओं से भरा पड़ा है। यहाँ के कण-कण में मीरा के भजन, पन्ना धाय के त्याग, महाराणा प्रताप, गोरा–बादल, चेतक, रामदेव पीर, ढोला–मारू और वीर तेजा जी की कहानियाँ बसी हुई हैं। उन्हीं में से एक प्रेम लोक कथा है– ‘ढोला–मारू’ जिसे सबसे पहले कवि किलोल ने काव्यमय किया था। यह लोक गीतों के रूप में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में गाई जाती है।)

बात लगभग ग्यारह सौ साल पुरानी है। उस समय मारवाड़ क्षेत्र जो वर्तमान में राजस्थान का भू-भाग है, के पूंगल राज्य, जो आजकल बीकानेर के पास है, में पिंगल नाम का राजा था। उसके एक बहुत सुंदर प्यारी– सी बेटी थी- मरवड़ी जिसे प्यार से सब मारू कहते थे।

एक बार पूंगल राज्य में भीषण अकाल पड़ा। बहुत वर्षों से वर्षा नहीं होने के कारण अन्न-जल का अभाव हो गया। सभी को वह राज्य छोड़ कर जाना पड़ा। राजा पिंगल भी अपने मित्र नरवर के राजा नल के पास चले गए। दोनों राज परिवार प्रेम पूर्वक रहने लगे। राजा नल का एक बेटा था साल्ह कुँवर जिसे प्यार से ढोला कहते थे। जब राजा पिंगल और राजा नल ने दोनों बच्चों को प्यार से खेलते देखा तो उन दोनों का विवाह करने का निर्णय लिया। इस तरह धूमधाम से ढोला और मारू का विवाह हो गया। उस समय ढोला तीन और मारू डेढ़ वर्ष के थे। थोड़े समय पश्चात जब सुकाल आया यानी पूंगल राज्य में वर्षा हो गयी तब राजा पिंगल अपने परिवार सहित पूंगल राज्य लौट आए।

चूँकि मारू बहुत छोटी थी इसलिए उसे नरवर छोड़ कर नहीं आए। मारवाड़ में विवाह बचपन में हो जाता था लेकिन लड़की की विदाई (गौना) बड़े हो जाने पर ही होता था। इधर जब राजकुमार ढोला बड़ा हो हो गया तो नरवर के राजा नल ने उसका दूसरा विवाह मालवा की राजकुमारी माल्वनी के साथ कर दिया।

यहाँ राजकुमारी मरवड़ी (मारू) भी बड़ी हो गयी थी। राजा पिंगल को बेटी के गौना करने का विचार आया तो राजा नल को संदेश भेजा। सौतन माल्वनी को जब पता चला कि पूंगल से संदेशवाहक आ रहा है तो माल्वनी ने संदेश वाहक को मरवा दिया। एक बार राजकुमारी मारू ने सपने में राजकुमार ढोला को देखा तब से राजकुमारी विरह अग्नि में जलने लगी। कई संदेश वाहक भेजने पर भी राजा नल का कोई संदेश नहीं आया तो उन्होंने डाढ़ियों (लोक याचक गायकों) को गीत में संदेश बना कर भेजा।

राजकुमारी मारू ने उन गायकों को राग मल्हार में विरह गीत सिखा कर भेजा। नरवर पहुँच कर जब महल के सामने डाढ़ियों ने खड़े होकर गीत गाए और राजकुमार ने वह विरह गीत सुना तो उसे मारू की याद आ गयी। पिता नल से बात कर राजकुआर ढोला पूंगल जाने को तैयार होने लगा। उसकी पहली पत्नी ने रोकने के बहुत प्रयास किए लेकिन ढोला नहीं माना और ऊँट पर सवार हो कर पूंगल रवाना हो गया।

उसके रास्ते में बहुत सी विपदाएँ आईं लेकिन अपनी पहली पत्नी और प्रिय ढोला को सफ़लतापूर्वक अपने राज्य नरवर ले आया जहाँ ढोला–मारू का राजसी स्वागत हुआ। ढोला अपनी दोनों पत्नियों के साथ आनंद से रहने लगा।

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