एक दोस्ती ऐसा भी…(लघुकथा)

“लो दादाजी …ये आया….आया…एरोप्लेन, आपके पास, इस में बैठकर जल्दी आ जाओ मेरे घर” पाँच वर्षीय क्षितिज ने साथ वाले फ्लैट में व्हीलचेयर पर बैठे एक वृद्ध की ओर अपने कागज का बनाया हुआ जहाज उड़ा दिया। उधर उनके नौकर ने फुर्ती से कैच कर उन्हें पकड़ाया तो वह ज़ोर-ज़ोर से ठहाका लगाते हुए उसका परीक्षण करने लगे। “अरे वाह!, बेटा! ये तो बहुत सुंदर है, मुझे भी सीखा दो ना ऐसा बनाना” बच्चों जैसी मासूमियत चेहरे पर लाते हुए उन्होने कहा।

डॉ॰ सविता स्याल
गुरुग्राम, हरियाणा 

सुबह, शाम क्षितिज और दादा जी की दो बार की मुलाक़ात अब उनकी दिनचर्या बन चुकी थी जिसकी दोनों उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं। क्या करें पूरे शहर में लॉकडाउन के कारण सभी घरों में बंद हैं। क्षितिज के पापा, मम्मी दोनों आजकल “वर्क फ़्रोम होम” के कारण लगभग पूरा दिन लैपटॉप पर ऑफिस का काम करते रहते है और  वह अकेला ‘बोर’ हो जाता है।

दूसरी ओर चलने-फिरने में असमर्थ एक वृद्ध व्हीलचेयर पर अपनी बालकनी में आकर बैठते हैं उनके बहू-बेटा भी पूरा दिन ऑनलाइन काम में व्यस्त रहते हैं। धीरे-धीरे दादा जी उसे नये-नये कहानियाँ-किस्से सुना उसका मनोरंजन करते हैं तो ’डील’ के अनुसार क्षितिज भी रात को याद की हुई एक नयी कविता या कहानी उन्हें सुनाता है। अब तो वह अपनी पेपर कटिंग के डिजाइन और नयी बनाई हुई ड्राइंग भी उन्हें दिखा कर खूब शाबाशी लेता है।

इस मुलाक़ात का आकर्षण क्षितिज से दूध का गिलास और नाश्ता भी बिना किसी सिर खपाई के ’फिनिश’ करवा देता है। उधर दादाजी भी अपनी दिनचर्या निपटा, बालकनी में आने के लिए लालायित रहते हैं…. उम्र के अंतर को ठेंगा दिखाती, परिस्थितिजन्य यह दोस्ती, उन दोनों के ही नहीं, उनके परिवार के सभी सदस्यों के चेहरों पर मुस्कान दे जाती है।

11 thoughts on “एक दोस्ती ऐसा भी…(लघुकथा)”

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