टेक केयर (लघुकथा)
पापा बहुत ख़ुश थे कि उनका बेटा विदेश में अच्छी तरह से सैटल हो गया था। बेटे ने वहीं एक विदेशी युवती से शादी कर ली और उनके दो बच्चे भी हो गए। अब तो उसने अपना एक अच्छा सा मकान भी ले लिया है और बच्चों के साथ मज़े से वहीं रह रहा है। […]
पापा बहुत ख़ुश थे कि उनका बेटा विदेश में अच्छी तरह से सैटल हो गया था। बेटे ने वहीं एक विदेशी युवती से शादी कर ली और उनके दो बच्चे भी हो गए। अब तो उसने अपना एक अच्छा सा मकान भी ले लिया है और बच्चों के साथ मज़े से वहीं रह रहा है। […]
एक ऐसी महिला, जिनके बचपन में ही उनके पिता का देहांत हो गया, कम उम्र में ही विवाह हो गया, बचपन में स्कूल नहीं जाने दिया गया, लेकिन फिर भी उसने उच्चा शिक्षा प्राप्त किया, वकील बनी, स्वतन्त्रता सेनानी बनी, समाज सुधारक बनी और आजादी के बाद संविधान सभा के लिए चुने जाने वाली पहली
नजर बचाकर निकलना ही चाहता था कि बड़े मियां आकर सामने खड़े हो गये। मैंने झुककर अदब से सलाम किया तो तुनकते हुए बोले “ये सलाम ही करते रहोगे कभी हाय-हैलो भी कर लिया करो मियां।” मुझे हैरानी तो हुई मगर अचानक मुंह से निकल पड़ा “जब से होश संभाला है तब से सलाम ही
दिल तो बच्चा है जी (व्यंग्य) Read More »
ये प्रेम कोई बाधा तो नहीं तुम आँचल समेटे कहती हो मैं मृदु बातों में उलझा ही क्यों ये भंवर सजीले हैं मितवा जो हम दोनों को ही ले डूबेंगे ये मोह का जाल है प्रेम भरा जिसमें प्रेम के पक्षी फँसते ही हैं, फिर भी ये प्रेम कोई बाधा तो नहीं तुम अक्सर इस
ये प्रेम कोई बाधा तो नहीं Read More »
“एक ही घर में अब एक साथ रहना बहुत मुश्किल है बाबूजी। मुझे अपना हक चाहिए।” बड़े बेटे राजेश ने अपनी बात रखी। “आज तुम्हें क्या हुआ राजेश! पहले तो ऐसी बातें नहीं किया करते थे; और बेटे, एक साथ रहने में ही सबकी भलाई है।” बूढ़े व बीमार पिता गोपाल जी ने कहा- “देखो
वसीयतनामा (लघुकथा) Read More »
आज़ादी के परवानों को, याद हमेशा करना। स्वर्ग में बैठे उन वीरों को ठेस लगेगी वरना।। लड़ी लड़ाई आज़ादी की, फूले नहीं समाए हैं। ज़र्ज़र कश्ती को साहिल तक लेकर वे ही आए हैं।। लाठी गोली बम धमाके, रूखी सूखी फाकम फाके, जान की बाज़ी लगा गए वो, थे वीर पूत
सत्य अहिंसा और धर्म, वीरों के जहां श्रृंगार रहे, त्याग प्रेम और पतिव्रत, स्त्री जाति का मान रहे। उस दिव्य धरातल का यशगान कहूं तो कहूं भी क्या, जिस पुण्यभूमि को निखिल विश्व जय जय हिंदुस्तान कहे। राम भरत केशव अर्जुन और कर्ण जैसे महादानी, ध्रुव प्रहलाद लव कुश और कालिदास से महाज्ञानी। भीष्म सरीखे
सालों से जैसे जिया नहीं, जी भर के जीने को जी चाहता है! हसरत की पोर-पोर खुली रह गयी हो जैसे, उनके प्यार की सतरंगी बारिश में भीग जाने को जी चाहता है! खुल के कभी ना नाच सका मन मयूरा, बूंदों संग अठखेलियों को जी चाहता है! हर सांस ऐसी हो कि तन मन