एक ऐसी महिला, जिनके बचपन में ही उनके पिता का देहांत हो गया, कम उम्र में ही विवाह हो गया, बचपन में स्कूल नहीं जाने दिया गया, लेकिन फिर भी उसने उच्चा शिक्षा प्राप्त किया, वकील बनी, स्वतन्त्रता सेनानी बनी, समाज सुधारक बनी और आजादी के बाद संविधान सभा के लिए चुने जाने वाली पहली महिला बनी। उसके सामाजिक कार्य आज भी उस महिला की जीवटता को दर्शाते हैं। उसने जीवन भर कभी कोई आभूषण या सौन्दर्य प्रसाधन का प्रयोग नहीं किया लेकिन लोगों के जीवन को सुंदर बनाने का कार्य करती रही। इस महिला का नाम था दुर्गाबाई देशमुख।

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
इनकी माँ कांग्रेस से जुड़ी थीं। उनके प्रभाव के कारण बचपन से ही इनका झुकाव स्वतंत्रता आंदोलन की तरफ हो गया था। वह गांधी जी के विचारों और जीवन शैली से बहुत प्रभावित हुईं। उन्होने जीवन भर कभी कोई आभूषण या सौन्दर्य प्रसाधन का प्रयोग नहीं किया। गांधी जी के नेतृत्व में होने वाले सविनय अवज्ञा आंदोलन और नमक सत्याग्रह में उन्होने बढ़-चढ़ कर भाग लिया। वह अपनी माँ के साथ घूम घूम कर खादी के कपड़े बेचा करतीं थीं। टी प्रकाशम के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश में गांधी का नमक सत्याग्रह शुरू हुआ। दुर्गाबाई ने इसमें भाग लिया। परिणाम यह हुआ कि 25 मई 1930 को उन्हें गिरफ्तार कर एक वर्ष की सजा सुनाई गई। पर जेल से बाहर आने के बाद भी उन्होने स्वतन्त्रता आंदोलन में भाग लेना नहीं छोड़ा। उन्हें फिर गिरफ्तार कर तीन वर्ष के लिए जेल में डाल दिया गया।
जेल के समय का सदुपयोग उन्होने अँग्रेजी भाषा सीखने में किया।
समाज सेवा में योगदान
दुर्गाबाई कई सामाजिक संस्थाओं से जुड़ी हुई थीं और इनके माध्यम से विशेषकर महिलाओं और दृष्टिबाधित लोगों के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया। ब्लाइंड रिलीफ एसोसिएशन की अध्यक्ष रहते हुए उन्होने दृष्टिबाधित लोगों के लिए एक स्कूल-छात्रावास और एक ‘प्रकाश इंजीनियरिंग कार्यशाला’ की स्थापना की।
उन्होने आन्ध्र महिला सभा, विश्वविद्यालय महिला संघ, नारी निकेतन जैसी कई संस्थाओं के माध्यम से महिलाओं के बहुपक्षीय उत्थान के लिए सराहनीय कार्य किया।
स्वतन्त्रता के बाद 1948 में उन्होने तेलगु भाषी बच्चों के शैक्षणिक जरूरतों को पूरा करने के लिए आंध्र एजुकेशन सोसायटी (AES) की स्थापना की।
स्वतन्त्रता के बाद योगदान
1946 में विधान परिषद के लिए चुनाव हुआ जिसमें वे मद्रास प्रांत से चुनी गई। यही विधान परिषद बाद में संविधान सभा बन गई जिसने देश के चलाने के लिए संविधान बनाया था। वह संविधान सभा के अध्यक्षों के पैनल में एकमात्र महिला थीं। संविधान सभा के सदस्य और कानून विशेषज्ञ के रूप में उन्होने कई सामाजिक कल्याण कानून के निर्माण के सहयोग दिया। स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेने वाली आंध्र प्रदेश की वह पहली महिला थीं।
लेकिन 1952 के चुनाव में वह जीत नहीं सकीं। बाद में उन्हें योजना आयोग का सदस्य बनाया गया। इस पद पर रहते हुए भी उन्होने समाजिक कल्याण को हमेशा दृष्टिगत रखा। उनके ही प्रयासों से समाज कल्याण पर राष्ट्रीय नीति बनी और 1953 में ‘केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड’ की स्थापना हुई। इस बोर्ड की पहली अध्यक्ष उन्हें ही बनाया गया था। इस पद पर रहते हुए उन्होने समाज कल्याण के कार्यक्रमों और योजनाओं को चलाने के लिए बड़ी संख्या में स्वयंसेवी संगठनों को संगठित किया। इस संगठनों का कार्यक्षेत्र शिक्षा, प्रशिक्षण, और जरूरतमन्द महिलों एवं बच्चों का पुनर्वास करना था। योजना आयोग ने ‘भारत में समाज सेवा का विश्वकोश’ उनकी देखरेख में ही प्रकाशित किया।

1958 में भारत सरकार द्वारा स्थापित ‘शिक्षा परिषद’ की पहली अध्यक्ष भी दुर्गाबाई देशमुख को ही बनाया गया था। ‘राष्ट्रीय महिला शिक्षा समिति’ की वह अध्यक्षा थीं जिसे उनके नाम पर ‘दुर्गाबाई देशमुख समिति’ भी कहा जाता है। इस समिति ने 1959 में महिला शिक्षा के उत्थान के लिए कई महत्वपूर्ण शिफ़ारिशें की थी।
1962 में उन्होने गरीब लोगों के इलाज के लिए एक नर्सिंग होम की स्थापना की जो आज दुर्गाबई देशमुख हॉस्पिटल के नाम से जाना जाता है।
1963 में अमेरिका के वाशिंगटन में होने वाले वर्ल्ड फूड कॉंग्रेस में भाग लेने वाले प्रतिनिधि मण्डल में भी वह शामिल थीं।
दुर्गाबाई देशमुख की शिक्षा और व्यवसाय
उनकी प्रारम्भिक शिक्षा तो घर पर ही हुई पर स्वाध्याय और शिक्षकों की सहायता से उन्होने हिन्दी और अँग्रेजी भाषा में दक्षता हासिल कर ली थी। स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेने के कारण दुर्गाबाई को 1930-33 के बीच दो बार जेल में डाला गया। लेकिन जेल से आने के बाद उन्होने पढ़ाई जारी रखा। मद्रास विश्वविद्यालय से नियमित रूप से पढ़ाई शुरू किया। राजनीति शास्त्र में बीए और एमए करने के बाद 1942 में उन्होने मद्रास विश्वविद्यालय से ही कानून की डिग्री ली और मद्रास उच्च न्यायालय में वकालत करने लगीं। हत्या के केस में बहस करने वाली वह पहली महिला वकील थीं।
पुरस्कार और सम्मान
उन्हें भारत सरकार द्वारा 1975 में पद्मभूषण से सम्मानित किया। 1982 में इन पर एक डाक टिकट भी जारी किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें ‘पॉलजी हॉफमैन’, ‘नेहरू साक्षरता पुरस्कार’, ‘यूनेस्को पुरस्कार’ इत्यादि अनेक सम्मान भी मिले।
व्यक्तिगत जीवन
दुर्गाबाई का जन्म आंध्र प्रदेश के राजमुन्द्री जिले के काकीनाडा नामक स्थान पर एक माध्यम वर्गीय परिवार में 15 जुलाई 1909 को हुआ था। उनके पिता का नाम श्री बीवीएन रामाराव और माता का नाम श्रीमती कृष्णवेनम्मा था। उनके पिता एक सामाजिक कार्यकर्ता थे लेकिन उनका देहांत तभी हो गया जब दुर्गाबाई बच्ची ही थीं। उनका पालन पोषण उनकी माँ ने ही किया था। वह कांग्रेस कमिटी की सचिव थीं। माता-पिता के संस्कारों के कारण बाल्यकाल से ही उनका झुकाव समाजसेवा, स्वतन्त्रता संग्राम और राजनीति में हो गया।
पर उस समय प्रचलित प्रथा के अनुसार आठ साल की उम्र में ही इनका विवाह एक जमींदार से करा दी गई। लेकिन यह विवाह ज्यादा दिन नहीं चल सका। 15 साल की आयु में उनका यह विवाह खत्म हो गया। उसके बाद समाज सेवा और देश सेवा के काम में जुट गईं।
बालिका दुर्गा को पढ़ने में बहुत रुचि थी। पर उन दिनों लड़कियों को स्कूल नहीं भेजा जाता था। पढ़ाई के प्रति उनकी लगन देख कर उनके पड़ोस में रहने वाले एक हिन्दी शिक्षण ने उन्हें घर पर ही पढ़ाना शुरू किया। तेलगु भाषी आंध्र प्रदेश में हिन्दी के प्रचार का कारण यह था कि स्वदेशी आंदोलन के बाद से हिन्दी के प्रचार प्रसार को स्वतन्त्रता आन्दोलन से जोड़ कर देखा जाता था।
जल्दी ही अपने हिन्दी शिक्षक के सहयोग से हिन्दी में इतनी दक्षता हासिल कर ली कि उन्होने लगभग 14-15 वर्ष की उम्र में 1923 में लड़कियों को हिन्दी सिखाने के लिए एक स्कूल खोल लिया। उनके इस प्रयत्न का पता जब गांधी जी को लगा तब उन्होने दुर्गाबाई की सराहना करते हुए उन्हें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया। किशोर अवस्था की दुर्गाबाई को इससे बहुत प्रेरणा मिली। वह गांधी जी प्रभावित होकर अब सक्रिय रूप से स्वतन्त्रता आंदोलन में हिस्सा लेने लगीं। ऐसा करने वाली वह आंध्र प्रदेश की पहली महिला थीं जो अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बनीं।
1953 में उन्होने तत्कालीन वित्त मंत्री चिंतामन देशमुख (सी डी देशमुख) से दूसरा विवाह किया।
दुर्गाबाई देशमुख ने ‘द स्टोन दैट स्पीकेथ’ नामक किताब लिखीं। उनकी आत्मकथा ‘चिंतामन और मैं’ उनके निधन से एक साल पहले प्रकाशित हुई थीं।
9 मई 1981 को आंध्र प्रदेश में उनका निधन हो गया।
लेकिन उन्होने हजारों-लाखों महिलों को इस योग्य बनाने का रास्ता प्रशस्त कर दिया जो यह साबित कर सके कि महिलाएं केवल घर ही नहीं बल्कि समाज और देश के निर्माण में भी अहम योगदान दे सकतीं हैं।
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