ये कैसी आस्था है?

मैं कई बार सड़कों के किनारे, पेड़ों के नीचे, नदियों के तट पर, रखे देवी-देवताओं की अनेक टूटी-फूटी, खंडित मूर्तियाँ, फोटो आदि देखती हूँ। आर्टिफ़िशियल फूल मालाएँ, माता की चुन्नी, भगवत नाम लिखा हुआ पटका या अंगवस्त्र इत्यादि भी होते हैं। शायद आपलोगों ने भी देखा हो। गाँव से अधिक शहरों में ऐसे दृश्य दिखते हैं। साथ में दिए गए कुछ फोटो उस कोलकाता शहर में दुर्गापूजा के बाद की है, जहां का दुर्गा पूजा अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध है। 

इन्हें देख कर मेरे मन में चार तरह के सवाल आते हैं:

कौन रखता होगा वहाँ उन्हें?

कोई नास्तिक तो नहीं होगा वह। कोई-न-कोई आस्तिक ही होगा जिसने पहले उनकी पूजा की होगी। अब वे पुराने और खंडित हो गए, उन्हें रखने का कोई स्थान मिला होगा, तो कहीं भी फेंक दिया, कहीं भी रखे दिया? ये कैसी आस्था है, जो अपने आराध्य को, जिसकी उन्होने बहुत समय तक पूजा की है, उन्हें कहीं भी फेंक देते हैं? एक ऐसी संस्कृति में जहां एक साधारण व्यक्ति के मृत शरीर को भी आदर दिया जाता है, भले ही वह शरीर दुश्मन का ही क्यों न हो। जहां राम और कृष्ण जैसे अवतारी पुरुष ने इसलिए पार्थिव शरीर का त्याग नहीं किया और शरीर के साथ ही अपने धाम गए कि उनका शरीर, जो की उनकी साक्षात मूर्ति है को जलाना न पड़े, वहाँ कैसे लोग अपने इष्ट के साथ ऐसा कर सकते हैं?

कहाँ से आते हैं पूजन सामग्री में कूड़ा?

हमारी पूजा पद्धति में ऐसा तो कुछ नहीं होता जो प्रकृति में घुलमिल नहीं जाता हो। फूल, दूर्वा, बेलपत्र, तुलसी, अक्षत यानि चावल, चन्दन, तिल, जौ, कर्पूर इत्यादि ही तो हमारी पूजा की सामग्री होते हैं। बचपन में मैंने अपने पिता जी को पार्थिव महादेव की पूजा करते हुए देखा है। घर से लगे एक स्थान को मिट्टी या ईंट से घेर दिया गया था। डेली पूजा से निकलने वाली सामग्री ‘निर्माल्य’ और मिट्टी से बने ‘पार्थिव महादेव’ सबको पूजा के बाद वहीं आदरसहित रख दिया जाता था। घर के आसपास उस ‘निर्माल्य’ के रहने से हम लोगों में यह भरोसा था कि कोई नेगेटिव एनर्जी हमारे घर में नहीं आएगी। वर्षों तक एक ही जगह निर्माल्य डालने से भी वहाँ कुड़े का कोई टीला नहीं बनाता था। क्योंकि सभी सामग्री मिट्टी में मिलने वाली ही होती थी, फूल-पत्ती खाद बन जाते थे। बरसात में यहाँ कई फूलों के पौधे, जैसे गेंदा और तुलसी के पौधे अपने-आप उग जाते थे।

माना कि अब शहरों के फ्लैट में सिमटने के बाद हमारे पास मिट्टी भी नहीं है। लेकिन कोई बड़ा गमला या पुराने बड़े डब्बे, टंकी, इत्यादि में इसे हम अब भी रख सकते हैं। विश्वास कीजिए ये निर्माल्य बनेंगे, खाद बनेंगे लेकिन कूड़ा नहीं बनेंगे।         

मिट्टी में नहीं मिलने वाली सामग्रियों का क्या करें?

लेकिन अब हम बहुत से ऐसे सामाग्री प्रयोग करने लगें हैं जो मिट्टी में नहीं मिलते हैं। हालांकि इसमें से ज़्यादातर पूजा के लिए जरूरी नहीं होते हैं बल्कि साधारणतः सजावट के काम आने वाली सामग्री होती हैं।

धातु की मूर्ति, शीशा या धातु के फ्रेम वाले फोटो, प्लास्टिक या कपड़े के बनी फूल-मालाएँ, मंदिर या भगवान को सजाने के लिए प्रयुक्त अन्य आर्टिफ़िशियल चीजें, अगरबत्ती, कर्पूर आदि के डब्बे, जिनपर कभी-कभी भगवान की मूर्ति भी होती हैं। तीर्थयात्रा जाने वाले लोग अपने विशेष सगे-संबंधियों और मित्रों के लिए मंहगे वाले प्रसाद का पैकेट लेते हैं जिसमें उस देवी-देवता की आकृति वाले सिक्के भी होते हैं। छोटे-छोटे मूर्ति, फोटो आदि भी ले लेते हैं। वैष्णो देवी जाने वाले लोग अक्सर चुन्नी खरीदते हैं, उन्हें सिर पर बांध कर फोटो खिचवाते हैं। बहुत लोग दुर्गा पूजा आदि में भी इसका प्रयोग करते हैं। बहुत सारी संस्था भगवत नाम लिखा हुआ पटका आदि अपने अनुयायियों के देती हैं। लेकिन फोटो खिंचवाने के बाद उसके बाद उसका क्या प्रयोग होता है? अलमारी आदि में कुछ दिनों तक बांध कर रख लेते हैं। पवित्र हैं इसलिए कूड़े में फेंक नहीं सकते हैं। फिर…., फिर ये सारी चीजें अंततः सड़कों के किनारे, नदियों के किनारे या नदियों के पानी में पहुँच जाती है।   

अगर पर्यावरण की बात छोड़ भी दें तो नदियों में या नदी किनारे डालने पर कई बार ये फोटो फ्रेम, धातु या शीशे के टुकड़े, आदि स्नान करने वालों को घायल कर देते हैं।

क्या हम इनका प्रयोग कम नहीं कर सकते? इन्हें हम सुरक्षित रूप से कहीं मिट्टी के नीचे या ऐसे जगह नहीं रख सकते जहां वे भी सम्मान से रहें और किसी को नुकसान भी न हो।

बच्चों को हम क्या संस्कार दे रहें हैं?

अगर हम काम निकलने के बाद अपने इष्टदेव को, अपने आराध्य को, इस अपमानजनक स्थिति में पहुंचा सकते हैं तो क्या हमारे बच्चे अपना काम निकलने पर अपने माँ-बाप को कहीं भी नहीं पहुंचा सकते हैं? क्या यही संस्कार हम अपने बच्चों को दे रहे हैं? अपने आराध्य को हम आदर सहित विदाई भी नहीं दे सकते हैं?

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