शादी की तैयारी पुरी हो चुकी है। बारात द्वार पर आ गई है। सभी लोग इधर-उधर कर रहे हैं। बारातियों का स्वागत कैसे किया जाय, रामप्रसादजी इसके लिए बहुत चितिंत हैं। क्या करूँ, क्या न करूँ। उनकी पत्नी परेशान देखकर बोली- “क्यों न महेन्द्रजी से कुछ पैसा उधार ले लेते हैं और लड़केवाले को जो वादा किए हैं, उसको पूरा कर देते। रामप्रसादजी- “कितनी बार उनके आगे हाथ जोड़ा, पाँव पड़ा, लेकिन वो कंजूस- मक्खीचूस टस-से-मस नहीं हुआ।

पटना
“एक बार और प्रयास क्यों नहीं करते!’’- उनकी पत्नी बोली।
“कहती हो तो एक बार और महेन्द्रजी के सामने जाकर हाथ फैलाता हूँ। लेकिन उम्मीद कम है।’’
हुआ भी वैसा ही, नहीं माने। कितनी ही रामप्रसादजी, महेन्द्रजी के सामने गिरगिराए लेकिन एक पाई भी उधार नहीं दिए। मायूस चेहरा लेकर वापस लौटना पड़े।
लड़केवाले भी जल्लाद निकले। अपनी पगड़ी उसके पैर के पास रख दिया, लेकिन लड़के के पिता ने पगड़ी को लात मार कर फेंक दी। पढ़ा-लिखा लड़का भी अपने बाप के आगे कुछ नहीं बोल पाया। बारात वापस चली गई। रामप्रसादजी की बेटी गीता की शादी नहीं हो पाई।
पढ़ी-लिखी होने के बावजूद भी शादी के मंडप से बिन ब्याही ही उठना पड़ा। समाज का कोई भी सदस्य मदद करने नहीं आया। खुशी का माहौल मातम में बदल गया।
समय बितता गया। तीन-चार माह बीत गया। रामप्रसादजी मंदिर बनवाने के नाम पर सभी से चंदा के रसीद काट रहे हैं। काफी लोग उत्साह से चंदा दे रहे हैं। गिरधारी लालजी तो पाँच हजार रूपया अपने मन से रसीद काट कर दे दिए। अधकट्टी रसीद रामप्रसादजी, महेन्द्र बाबू को दिखाए- “देखिए, गिरधारी बाबू ने स्वयं पाँच हजार की रसीद काटी है साथ ही पाँच-पाँच सौ के दस कड़क नोट संदूक से निकाल कर दिए हैं। उनका नाम मंदिर के शिलापट्ट पर लिखा जाएगा। आप भी चंदा देकर पुण्य कमाइए ना!’’
महेन्द्र प्रतापजी मुस्कुराते बोले- “कितना देना होगा। मेरा नाम भी बड़े अक्षरों में मंदिर के द्वार पर लिखा होना चाहिए।’’ ’’एक लाख इक्यावन हजार से कम क्या दिजिएगा। देनेवाले की तो कमी नहीं है फिर भी आपकी इच्छा, जितना चाहे दे सकते हैं।’’
“अच्छा! शाम को घर आइए।’’ शाम को महेन्द्र बाबू दो लाख इक्कीस हजार के चेक काट के दे दिए। देखकर रामप्रसादजी की आँखों से आँसू छलक पड़े और पिछली बातें स्मरण होने लगी। उन्होंने नमी आँखों से चेक लिए और निकल गए। मन में कहा- “पाप कम करने के लिए पुण्य कर रहा है, लेकिन वो भी पुण्य का ही कार्य था।”
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