पुनरागमन है…

व्यग्र पाण्डे
कर्मचारी कालोनी, गंगापुर सिटी,
राजस्थान
 

इसे क्यूँ कहते हो बुढ़ापा 

ये तो पुनरागमन है मेरे बचपन का

बच्चे ही सही 

पकड़ हाथ चलाते हैं मुझे 

रोटी ना सही 

दवाई कह कहकर खिलाते हैं मुझे 

कभी-कभी मचल जाता हूँ   

खो भी जाता आपा

इसे क्यूँ कहते हो बुढ़ापा 

ये तो पुनरागमन है मेरे बचपन का।

सिर में छितरे छितरे बाल 

मुँह पोपला सा

लगता दूध के दाँत आने वाले

हर पल मेरा ध्यान रखते घरवाले

क्यूँ कहते बुढ़ापा जमाने वाले 

ये सवाल पाँच का है या पचपन का

ये तो पुनरागमन है मेरे बचपन का।

मन करता बाहर जाऊं 

टहलूं दगड़े में मित्रों में समय बिताऊं 

पर अब भी टोका टोकी बीच

कई बंदिशे रहती हैं

घर की हर जिह्वा मुझसे कहती है  

नहाना धोना बुरा लगता तन का 

क्यूँ कहते हो बुढ़ापा इसे  

ये तो पुनरागमन है मेरे बचपन का।  

****

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top