मानव-प्रकृति का सम्बन्ध

मानव और प्रकृति के बीच बहुत गहरा सम्बन्ध है। मानव प्रकृति का एक अभिन्न अंग है। प्रकृति के बगैर मानव की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। मानव शरीर प्राकृतिक तत्त्वों से बना है। भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश यह पञ्च महाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार- यह आठ प्रकार के भेदों वाली मेरी अपरा प्रकृति है। ये आठ प्रकार की प्रकृति समूचे ब्रह्माण्ड का निर्माण करती है।

शिखा श्रीवास्तव
अयोध्या, उत्तर प्रदेश

      मनुष्य के लिए प्रकृति से अच्छा गुरु नहीं है। प्रकृति हमें महानता, सौन्दर्य, धैर्य, कड़ी मेहनत, शान्ति, नवीकरण, बहुतायत, उदारता, दया, आत्मनिर्भरता और बहुत सारे जीवन को बदलने वाले पाठ सिखाती है। प्रकृति के महान कवि विलियम वर्ड्सवर्थ कहते हैं “ज़रा वास्तविकता के उजाले में आओ, प्रकृति को अपनी शिक्षिका बनाओ।”

      कविकुल शिरोमणि कालिदास की शकुन्तला वन में ही पलती-बढ़ती है। कानन ही उसकी सखी, सहेली, सहचरी है, जब वह विदा होकर ससुराल जाती है, इसी प्रकृति के मानवीकरण करते हुए   कणव ऋषि कहते हैं “देवी-देवताओ से भरे वन वृक्षों! जो शकुंतला तुम्हे पिलाये बिना स्वयं जल नहीं पीती थी, जो आभूषणप्रिय होने पर भी स्नेह के कारण तुम्हारे कोमल पत्तो को नहीं तोड़ती थी, जो तुम्हारे पुष्पित होने के साथ उत्सव मनाती थी, वह शकुंतला अपने पति के घर जा रही है। तुम

सब मिलकर इसे विदा करो।”

      शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक- तीनो हीं दृष्टियों से प्रकृति मानव का पोषण करती हुए उसे जीवन में आगे बढ़ने  के लिए अग्रसर करती है।

      प्रकृति का सबसे बड़ा गुण है कि वह अपनी वस्तुओं का उपयोग स्वयं नहीं करती। “तरुवर फल नहीं खात है, सरवर पियहिं न पानकहि रहीम पर काज हित, संपत्ति संचहि सुजान।” प्रकृति किसी के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार नहीं करती है लेकिन मनुष्य जब प्रकृति के साथ अनावश्यक खिलवाड़ करता है तब प्रकृति अपना रौद्र रूप भी दिखाती है जिसे वह समय-समय पर सूखा, बाढ़, तूफ़ान के रूप में व्यक्त करते हुए मनुष्य को सचेत करती है।

      वर्तमान में हम सब करोना महामारी से जूझ रहे हैं। यह महामारी जैविक आपदा का हिस्सा है। इस महामारी ने न जाने कितने लोगों की जान ली है। कोरोना महामारी में प्राणवायु ऑक्सीजन की कमी ने हमें पर्यावरण के प्रति सजग कर दिया है।  आपदाओं से बचने के लिए हमें अपने चारों ओर के वातावरण को संरक्षित करना होगा। अतः हम कह सकते हैं कि मानव जीवन का अस्तित्व प्रकृति की गोद में पलता-बढ़ता है। प्रकृति से मनुष्य का सम्बन्ध अलगाव का नहीं अपितु प्रेम का है।  

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