किसी भी देश की भाषा और साहित्य उस की सभ्यता और संस्कृति का दर्पण होता है। क्योंकि वहां की भाषा का निर्माण उस स्थान के निवासियों द्वारा निर्मित होता है, इसीलिए उन के जीवन की झांकी उस भाषा में लिखित साहित्य में दिखती है। दूसरे जिस देश, काल का जो साहित्य होता है, वह उस स्थान तथा समय की ऐतिहासिक घटनाओं, सांस्कृतिक अवधारणाओं और मानवीय प्रवृतियों का जीवन्त दस्तावेज होता है। चाहे वह लोक साहित्य क्यों न हो, उस स्थान की माटी और सुगंध उसमें गुंथी रहती है। यही कारण है कि जब हम हिंदी साहित्य का इतिहास उठाते हैं, तो उसमें आदिकाल, मध्यकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल के भारतीय परिवेश और लिखित साहित्य का प्रमाणिक विवेचन मिलता है। उस काल की परिस्थितियों के बीच लिखित साहित्य में, यहाँ के जनजीवन के साक्षात भाव और प्रत्यक्ष विचार प्रस्तुत हुए हैं।

पश्चिम विहार, दिल्ली
इसीलिए उन प्रवृतियों के आधार पर ही आदिकाल या वीरकाल और भक्तिकाल को निर्गुन-सगुन धाराओं में विभाजित किया है। यदि रीतिकाल के साहित्य से उस वक्त की श्रृंगारिक वृति प्रकट होती है तो आधुनिक कालीन लेखन में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का राष्ट्रीय संघर्ष मिलता है। वस्तुतः मनुष्य और भाषा सदैव एक-दूसरे के पूरक रहे हैं, जिसकी व्याख्या हिंदी के विख्यात विद्वान श्री राहुल सांकृत्यायन के शब्दों से पूर्णतया स्पष्ट होती है। आजादी के बाद अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन के 35 वे अधिवेशन को समाप्त करते हुए उन का कथन था, “मनुष्य जब बना तब उसने भाषा सीखी और मनुष्यता उसमें तब जागृत हुई जब उसने भाषा के द्वारा साहित्य की अभिव्यक्ति करनी सीखी। साहित्य और भाषा मनुष्यता के समीप ले जाने वाली चीजें हैं। इसलिए साहित्यकारों की या कहें हिंदी वालों की आज के युग में जिम्मेदारी बढ़ गई है। आज देश को एकताबद्ध करने के लिए, हमारे जनों में मनुष्यता के भाव उत्पन्न करने के लिए हिंदी की बड़ी भारी जिम्मेदारी है।” (दिसंबर 1948)
यह तो भाषा की बात हुई, अब अगर हम भारतीयता का मतलब जाने तो भारत देश का नाम शाकुंतलम पुत्र भरत के नाम पर बना। और भारतीयता इस भूमि की ख़ास पहचान है, जो यहाँ की भाषा, वेशभूषा, खान-पान और रहन-सहन का द्योतक है। पूरी दुनिया में हमारी धरती को अध्यात्म से ओतप्रोत माना जाता है, जो प्राचीन वैदिक संस्कृति की देन है। प्राचीन काल में हमारे देश का नाम आर्यव्रत या भारत के नाम से ही विख्यात था, किन्तु मध्यकाल में तुर्कों और मुगलों के शासन काल के उपरान्त इसे हिन्दुस्तान भी कहा जाने लगा। और यहाँ की भाषा को हिन्दुस्तानी नाम दिया गया, जिसमें अरबी-फारसी शब्दों की प्रधानता मानी जाने लगी। यद्यपि अंगरेजी शासन काल में अंग्रेजी का प्रचलन भी हुआ, किन्तु सरकारी कामकाज और न्यायालयों में मुख्यतः उर्दू का ही प्रयोग होता था। इसीलिए आजादी के उपरान्त राष्ट्र भाषा और राष्ट्र लिपि के चयन में बाधाएं और समस्यायें उत्पन्न हुई और उर्दू की अरबी-फ़ारसी लिपि के समानांतर हिंदी की नागरी लिपि प्रयोग के लिए भी बड़ा विवाद पैदा हुआ।
इस विवाद के समाधान के लिए सन 1948 में ‘भारतीय लेजिस्लेटिव असेम्बली’ के अध्यक्ष श्री गणेश वासुदेव मावलंकर ने एक सार्वजनिक सभा में भाषण देते हुए कहा था, “विवाद मुख्यत: राजनैतिक है। देवनागरी और उर्दू लिपियों को जानना उत्तम होगा। इससे देश के बड़े और महत्वपूर्ण वर्गों को निकट लाने में मदद मिलेगी और भारत को गैरमजहबी राष्ट्र बनाने की समस्या अपने आप हल हो जाएगी।” कुछ ऐसा ही सवाल उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने आजादी से बहुत पहले अपने एक लेख में उठाया था, “तो क्या भाषा का अंतर है? बिलकुल नहीं। मद्रासी मुसलमान के लिए उर्दू वैसी ही अपरिचित वस्तु है, जैसे मद्रासी हिन्दू के लिए संस्कृत। हिन्दू या मुसलमान जिस प्रांत में रहते हैं, सर्वसाधारण की भाषा बोलते हैं। चाहे वह उर्दू हो या हिंदी, बांग्ला हो या मराठी।” (लेख- यह ज़माना साम्प्रदायिक अभ्युदय का नहीं है, 1934 में प्रकाशित आलेख)
वैसे संसद में आजादी के बाद से आज तक हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए सदैव मुद्दा बना रहा, जिसके कारण वैचारिक वैमनस्य भी जुड़ा रहा। चूँकि भाषा के साथ लिपि भी अभिव्यक्ति का माध्यम होती है, अतः हम दोनों स्तरों पर इसकी जांच करेंगे। अगर स्वतंत्रता पूर्व की बात करें तो महात्मा गाँधी समेत अनेक विख्यात नेता हिंदी को एकमात्र ऐसी भाषा मानते थे, जो सुदूर दक्षिण भारत तक देश को एकसाथ जोड़कर रख सकती है। यद्यपि भारत में अनेक भाषाएँ और बोलियां हैं और यह कहावत प्रसिद्ध है कि प्रत्येक चार कोस पर यहाँ जबान बदलती है। लेकिन अनेक हिंदी -अहिन्दी विद्वानों की सहमति के बावजूद भी राष्ट्रभाषा के नाम को लेकर विवाद पैदा हो गया। पंडित नेहरू ने स्वयं लिखा, “यह बात महत्वपूर्ण नहीं की हम अपनी भाषा को हिंदी कहें या हिन्दुस्तानी। हाँ, इतना अवश्य है कि प्रत्येक नाम के साथ उसका अपना इतिहास होता है और उससे एक स्पष्ट बोध होता है जो नाम के अर्थ को सीमित कर देता है।”
अखिल भारतीय हिंदी सम्मलेन के मेरठ अधिवेशन में हिंदी के विद्वान सेठ गोविंददास ने भी सपष्ट किया कि, “हिन्दुस्तानी के समर्थन में यह पहले ही मान लिया जाता है कि देश विभिन्न सम्प्रदायों में बंटा है और फिर सम्प्रदाय विशेष को संतुष्ट करने की नीति का अवलम्बन किया जाता है, जिसके कारण साम्प्रदायिक पृथकत्व को उत्तेजना मिलती है। ऐसी परिस्थिति में मैं स्पष्ट शब्दों में यह कह देना चाहता हूँ कि हिन्दुस्तानी नाम हम पर नहीं लादा जाना चाहिए। मैं तो यहाँ तक सुझाव कर चुका हूँ कि यदि हमारी राष्ट्रभाषा का एक नया नाम ‘भारती ‘रख दिया जाए, तो जनता उसका स्वागत करेगी।” उन्होंने आगे कहा कि हिंदी और रष्ट्रभाषा बनाने के कारणों के विषय में अब भी कुछ भ्रम फैला हुआ है। कहा जाता है कि धार्मिक आधार पर हिंदी का समर्थन किया जा रहा है। मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि हिंदी का समर्थन साम्प्रदायिक आधार पर नहीं उसकी योग्यता के आधार पर किया जा रहा है। (27 जनवरी 1949)
वस्तुतः यह भ्रम हिंदी को एक ख़ास वर्ग (हिन्दुओं) की भाषा मानने के कारण फैलाया गया, जिसके निराकरण के लिए श्री माखनलाल चतुर्वेदी का अधिवेशन में भाषण हुआ। उन्होंने हिंदी वालों को चेतावनी दी कि वे “हिंदी को हिंदुत्व की भाषा न बनाएं। हिंदी कभी साम्प्रदायिक भाषा नहीं हो सकती। देश की परिवर्तित स्थितियों में शासन, शिक्षण के लिए पारिभाषिक शब्दावली शीघ्र निर्मित की जाये। इस शब्दावली का मूल आधार संस्कृत और प्राकृत भाषाएं ही हो।”
लेकिन राजनीतिक विवाद की वजह से हिंदी राष्ट्रभाषा बनते-बनते रह गयी और इसे राजभाषा घोषित करके ही संतुष्ट होना पड़ा। क्योंकि आजादी के बाद अनेक विद्वानों और प्रबुद्ध प्रशासकों के प्रयासों के बावजूद कुछ नेताओं की राजनीतिक मंशाओं के कारण यह प्रस्ताव ‘नाम’ में ही उलझ कर रह गया। जिसके अनेक दुष्परिणाम अब देखने को मिल रहे हैं और हमारी आज तक कोई राष्ट्रभाषा नहीं है।
अगर हम ‘नाम’ का विश्लेषण करें तो ‘हिंदी’ शब्द ‘हिन्द’ से बना है। जो सिंध क्षेत्र को तुर्कियों द्वारा ‘हिन्द’ पुकारने के कारण प्रसिद्ध हुआ। इसी आधार पर यहाँ की जुबान को हिंदी भाषा कहा जाने लगा, जो लाख रुकावटों के बावजूद आज अन्तर्राजीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रचार-प्रसार पा रही है। एवं विदेशों में प्रवासी भारतीय हिंदी भाषा के माध्यम से देशी संस्कृति का प्रतीक बने हुए हैं, तो इस प्रकार हिंदी भाषा और भारतीयता एक-दूसरे के पूरक हैं। रेगिस्तानी इलाके में बसे अरब देश कुवैत में रेडियो पर हिंदी प्रसारण पर खुशी जाहिर करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्री उमेश चतुर्वेदी का कथन है, “वैश्विक उपनिवेशवाद और अर्थव्यवस्था के दबदबे के चलते डॉलर के साथ अंगरेजी का वर्चस्व अरब देशों में रहा है। उसके बीच हिंदी का धीरे-धीरे स्नेहिल जगह बनाना भारतीयता का ही विस्तार है।” (लेख- ‘कुवैत की अरबी आबोहवा में अब रोज गूंजने लगे हिंदी’, हिंदी हिंदुस्ताहन अखबार, 2024)
वैसे अमेरिका में मैंने स्वयं देखा था कि किस तरह प्रवासी अपने संगठन बनाकर भारतीय बच्चों के साथ अन्य विदेशी छात्रों को भी हिंदी भाषा पढ़ा रहे हैं। फिर वे चाहे बंगाल से हो या बंगलौर से, गुजरात से हो अथवा गोवा से, सभी लोग अपने बच्चों को हिंदी भाषा सिखा रहें हैं। इस तरह विदेशों में हिंदी भाषा भारतीयता की पहचान बन रही है, जिससे वहां के बच्चों में भारतीय संस्कृति की ओर आकर्षण बढ़ रहा है।
एक बात मैं विशेष तौर से कहना चाहूंगी कि चाहे भारत के अहिन्दी भाषी नागरिक हों या विदेशों में हिंदी सीखने वाले लोग, वे व्याकरण और शब्दावली में शुद्ध हिंदी बोलते और लिखते हैं। जबकि हिंदी पट्टी के विज्ञापनों में बहुत सी गलतियां और लेखकों द्वारा हिंदी भाषा में अभिव्यक्ति में लिपि की बहुत सी अशुद्धियाँ रहती है, जिन कों पढ़कर मन बड़ा विक्षुब्ध होता है। एक जगह ‘छिपी ‘शब्द ‘छीपी’ लिखा हुआ था, कभी-कभी तो इन अशुद्धियों के कारण पूरा अर्थ ही बदल जाता है। इसके साथ हम अपने देश में भाषा की पहचान को अपने ही हाथों मिटा रहे हैं, क्योंकि भारत में बच्चों को शुरू से अंगरेजी पढ़ने और सीखने को प्राथमिकता दी जा रही है।
इसीलिए अब जो जागरूकता है, वह ‘एलीट’ कही जाने वाली सोसाइटी में आनी जरूरी है। क्योंकि अपने बच्चों को अपनी मिटटी और संस्कार की गंध से दूर करने वाले यही लोग है, जो बच्चों में सहजता पनपने नहीं देते। जो भाषा बच्चा अपने परिवार में सुन और सीख रहा है, उसे उसके विपरीत अंगरेजी की तरफ मुड़ने के लिए बाध्य करते हैं। तीन या चार साल का बच्चा जैसे ही स्कूल जाता है, उसके संसार में तेजी से तबदीली होती है। जिस में उसका सामना एक अजनबी भाषा और लोगों से होता है, जिससे उसका बालमन चकित और भयभीत होता है। तो क्या ही अच्छा हो कि प्रारंभिक शिक्षा बच्चे की मातृभाषा और हिंदी में ही हो और कुछ बड़ा होने पर उसे अन्य भाषाओ से रूबरू करवाया जाए?
वस्तुतः हिंदी भाषा में लिपि के स्तर पर भी नागरी लिपि को छोड़कर, रोमन लिपि का प्रयोग अधिक होने लगा है। संचार माध्यमों और सोशल मीडिया में हिंदी के गीत और भजन रोमन लिपि में लिखे रहतें हैं, यह भारतीयता की भाषा को ख़त्म करने जैसा है। जैसे फेसबुक एवं व्हॉट्सएप पर ‘मैसेज’ या बातचीत को अपनी हिंदी जुबान में लिखते हुए भी रोमन लिपि का प्रयोग किया जाता है, जो एक खतरे का संकेत है।
यद्यपि हिंदी भाषा ने अंगरेजी के साथ अन्य भाषाओं की शब्दावली ग्रहण की है, लेकिन अब वक्तव्यों में आधे शब्द हिंदी में और आधे इंग्लिश में लिखे रहते हैं। जहाँ तक किसी भी प्रादेशिक और विदेशी भाषा को समझने के लिए उसका अंगरेजी में अनुवाद लिखा हुआ हो, वहां तक तो वह ठीक है। परन्तु ऐसे में भी उस भाषा को इंग्लिश के साथ हिंदी भाषा की देवनागरी लिपि में भी अनुवादित होना चाहिए। नहीं तो हिंदी भाषा में प्रयुक्त नागरी लिपि पिछड़ती जाएगी और रोमन का ही प्रभुत्व बना रहेगा। बड़ा अटपटा लगता है, हिंदी भाषा को रोमन लिपि में लिखा हुआ पढ़ना। पिछले दिनों जब मैंने अपने पौत्र के स्कूल से देशभक्ति के हिंदी गीत को रोमन लिपि में लिखा देखा, तो मुझे बड़ा खराब लगा। चूँकि कोई इसके लिए रोकता-टोकता नहीं, इसीलिए रोमन लिपि का धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है।
बहुत पहले महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि राष्ट्र को जोडने वाली भाषा हिंदी ही हो सकती है। उनका सोचना कितना सही था, जिन्होंने अहिन्दी भाषी होते हुए भी हिंदी की ताकत का अंदाजा लगाया। कवि श्री प्रयाग शुक्ल के शब्दों में, “आज बाजार से ही हिंदी की बात शुरू करें, तो सारे अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड जानते हैं कि हिंदी के बिना काम नहीं चलेगा। चूँकि हिंदी बोलने वालों का बाजार बहुत बड़ा है, तो हिंदी भाषी समाज भी पूरी दुनिया में फैलता जा रहा है।” (लेख- एक विशाल दुनिया में हिंदी बिना नहीं चलता कोई काम, हिंदी हिन्दुस्तान अखबार)
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