
सुबह सुबह अखबार में किशोरों द्वारा अपराध की खबरें देखकर सरिता जी का मन खिन्न हो गया। गंभीरता से अखबार पढ़ते-पढ़ते सरिता जी ने कहा,” पता नहीं आजकल के मां-बाप बच्चों को कैसे संस्कार देते हैं। ना ये शिष्टाचार जानते हैं, ना छोटे-बड़े का लिहाज करना जानते हैं। दिन भर भद्दे गाने सुनते और गुनगुनाते रहते हैं और आपस में गाली गलौज देते रहते हैं। जरा सा बड़े हुए नहीं कि छूरा-चाकू या पिस्तौल हाथ में उठा लेते हैं।”
उनके पति महेश जी बोले, “मां-बाप क्या करें? बच्चे पैदा होते ही टीवी पर उल्टी-सीधी खबरें देखते हैं, अश्लील विज्ञापन देखते हैं और मोबाइल मिल जाए तो फिर यूट्यूब या इंटरनेट पर विभिन्न साइट्स पर मानो अश्लीलता का पिटारा ही उनके हाथ लग जाता है।”
सरिता जी बोलीं, “यहीं तो मां-बाप की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बचपन से ही अच्छे संस्कार दें, उन्हें बुरी चीजों से दूर रखें और उनके लिए अच्छे उदाहरण बनें तो ऐसी नौबत ही क्यों आए?”
तभी पास बैठी बहू निकिता ने कहा, “मम्मी, आप ठीक कह रही हैं। अब तो फिर से हमारी पौराणिक परंपराओं को अपनाते हुए कुछ लोग बच्चों को गर्भ में ही संस्कार देने की कोशिश में जुटे हुए हैं। ठीक वैसे ही, जैसे अर्जुन पुत्र अभिमन्यु को मां के गर्भ में युद्धकला व चक्रव्यूह भेदने की कला और भक्त प्रहलाद को भगवान विष्णु की भक्ति गर्भ में ही प्राप्त हो गई थी।”
बहू की बात ने महेश जी और सरिता दोनों को चौंका दिया। निकिता बिल्कुल सही कह रही थी।
गर्भ में ही पर्सनेलिटी डिजाइनिंग
अब पेरेंट्स का एक तबका अपने गर्भस्थ शिशुओं को अच्छे संस्कार देने के प्रति बेहद गंभीर है जिसमें कई संस्थान व वेब डिजाइनर कंपनियां उनकी सहायता के लिए तत्पर हैं। आप चाहें कि आपका बच्चा संस्कृत में दिलचस्पी ले, शिष्ट बने, बड़ों का आदर करें, पारिवारिक परंपराओं का पालन करने वाला हो, तो इसकी प्लानिंग आपको शुरू से ही करनी होगी। इन दिनों गर्भ संस्कार का कांसेप्ट ट्रेंड में है। इसके तहत आप तमाम ऐप्स, वीडियोज और वर्कशॉप की मदद ले सकती हैं। इनमें आपको समझाया जाएगा कि बच्चे में हिंदू संस्कार, अध्यात्म और बुद्धि के बीज गर्भ में ही कैसे डाले जा सकते हैं। इनकी मानें तो मां गर्भ में ही अपने बच्चे की पर्सनैलिटी डिजाइन कर सकती है। इसके लिए गर्भावस्था के दौरान मां को संस्कृत श्लोक सुनने और पढ़ने होंगे। नियमित ईश वंदना करनी होगी। तरह-तरह की पजल सॉल्व करनी होगी ताकि दिमाग की एक्सरसाइज होती रहे। अपने बच्चे से गर्भ में ही बातें करनी होगी और मेडिटेशन व योग का नियमित अभ्यास करना होगा। यह सलाह देते हैं ‘कृष्ण कमिंग’ गर्भ संस्कार ऐप के संस्थापक प्रोफेसर विपिन जोशी।
मां की कोख संवेदनशील प्लेग्राउंड
वैज्ञानिकों का कहना है कि आपकी कोख शिशु के लिए एक संवेदनशील प्लेग्राउंड है। 10 हफ्ते का भ्रूण धीरे-धीरे हरकतें करने लगता है और अपने छोटे-छोटे अंगों को हिलाने डुलाने लगता है। 23 हफ्ते का गर्भस्थ शिशु मां और गर्भ से बाहर की अन्य आवाज में सुनने लगता है। कई बार तो वह इन ध्वनियों पर प्रतिक्रिया भी करने लगता है। मां के द्वारा खाए गए व्यंजनों का स्वाद भी महसूस करने लगता है। मां पेट को छूती है तो वह भीतर से इसका जवाब अपनी हरकतों से देने लगता है। मां उससे नियमित बातें करके उसकी बौद्धिक क्षमता को भी विकसित कर सकती है। इस दौरान गायन, संगीत, कहानियां पढ़ना आदि शिशु की बौद्धिक क्षमता के लिए बेहतर साबित होता है। ऐसा कई अध्ययनों में प्रमाणित हो चुका है।
करें पूरी प्लानिंग

डिजाइनर बेबी गढ़ने या गर्भ संस्कार देने में मददगार ऐप “ड्रीम चाइल्ड ऐप” के प्रमुख कार्यकारी धवल छेता कहते हैं कि पेरेंट्स अपने बेबी में जो गुण चाहते हैं उनको बकायदा सूचीबद्ध करना चाहिए। हाल ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की महिलावाहिनी राष्ट्र सेविका समिति ने अपनी शाखा संवर्द्धिनी न्यास के माध्यम से भी बच्चों में गर्भ संस्कार देने के लिए वर्कशॉप का आयोजन किया जिसमें उन्हें धार्मिक परंपराओं, संस्कृति आदि का संस्कार गर्भ में ही देने का दावा किया गया। ‘मैजेस्टिक गर्भ’ संस्कार ऐप के संस्थापक प्रशांत अग्रवाल का दावा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां हीराबेन का इंटरव्यू लिया था उन्होंने (हीराबेन) बताया कि जब नरेंद्र मोदी उनके गर्भ में थे तो वह अक्सर महाभारत सुना करती थीं। हर कोई जानता है कि नरेंद्र मोदी की राजनीतिक रणनीति और विचार अपने विरोधियों से कहीं आगे हैं।
अलग अलग तरीके
गर्भ संस्कार देने का हर ऐप या संस्थान का अपना अलग अंदाज है। जैसे ‘कृष्ण कमिंग’ एप का कार्यक्रम संकल्प पूजन से शुरू होता है। इसमें माता-पिता वादा करते हैं कि वे पूरी प्रक्रिया का गंभीरता से पालन करेंगे। इसके बाद गर्भवती महिला को वैदिक मंत्र सुनने की सलाह, न्यूट्रीशन पर ध्यान देने, काउंसलिंग, म्यूजिक थेरेपी आदि के अलग-अलग सेशन चलते हैं। अलग-अलग महीनों में प्रार्थनाएं, बीज शुद्धि आदि कार्यक्रम होते हैं। तीसरे महीने से पुंसवन संस्कार होता है। इष्ट देव का मंत्र 108 बार रोज पढ़ने की सलाह दी जाती है। फिर योगा एक्सपोर्ट्स एवं काउंसलर्स के अलग-अलग सेशन होते हैं। गर्भवती मां को स्ट्रेस से बचाने के कार्यक्रम होते हैं।
स्ट्रेस से बचे, अनुशासित रहे मां
चिकित्सकों का मानना है कि गर्भवती मां को किसी भी प्रकार के दबाव से बचना चाहिए। ऐसे कई शोध हो चुके हैं जो बताते हैं कि गर्भस्थ शिशु बाहरी वातावरण से पूरी तरह अनभिज्ञ नहीं रहते हैं। वे स्वाद, ध्वनि हलचल आदि कुछ सब कुछ महसूस करते हैं। एक अध्ययन में पाया गया कि जो मां अंतिम तिमाही में गाजर का जूस ज्यादा पीती थीं उनके बच्चे आगे चलकर प्लेन बेबी फूड की बजाय कैरेट फ्लेवर्ड बेबी फूड पसंद करते थे। इसी प्रकार गर्भ में सुनाई गई कविता, संगीत या बातों को वे जन्म लेने के बाद भी तुरंत पहचान लेते हैं। कोरिया में गर्भवती महिलाएं टेज्ञो का अभ्यास रोज करती हैं। उनका मानना है कि इससे उनके गर्भ शिशु में इंटेलिजेंस बढ़ेगी, पर्सनैलिटी निखरेगी और वे प्रतिभावान होंगे। यह परंपरा सैकड़ों वर्षो से चली आ रही है। टेज्ञो के तहत महिलाएं अपना व्यवहार, आचरण, स्वभाव, भोजन आदि अनुशासित रखती हैं। इसी तरह फ्रांस में गर्भवती महिलाएं हेप्टोनॉमी का पालन करती हैं। फ्रांसीसी वैज्ञानिक फ्रांस वेल्डमैन द्वारा विकसित हेप्टोनॉमी ऐसी तकनीक है जिसके तहत स्पर्श पर विशेष फोकस किया जाता है। यह पेरेंट्स और बच्चों में बॉन्डिंग के लिए इस्तेमाल की जाती है। टच एंड फील के माध्यम से बच्चे और मां में संवाद चलता रहता है। इससे मां को बच्चे की पोजीशन और मूवमेंट का भी पता चलता रहता है।
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