हमारे देश में शादी एक महत्वपूर्ण संस्कार है। कुछ समय पहले तक शादियां पूर्ण पारम्परिक तरीके से और अपने गृह नगर और अपने ही निवास स्थान में होती थी लेकिन आजकल शादियों का स्वरूप पूरी तरह से बदल गया है। आज़ शादी भी एक व्यवसाय बन गया है और उसकी व्यवस्था इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों द्वारा की जाने लगी है। इस कारण शादी पारिवारिक उत्सव न होकर स्टेटस सिंबल और प्रदर्शन का विषय बन गया है। आजकल शादियों में प्रदर्शन इस हद तक बढ़ गया है, जिसे देखकर लगता है कि यह शादी समारोह न होकर के कोई फैशन शो या फिल्मी इवेंट है।

हिन्दी साहित्यकार एवं स्वतंत्र पत्रकार
हैदराबाद
शादियों में बढ़ती फिजूलखर्ची न केवल चिन्ता का विषय है अपितु उसमें सुधार की अत्यन्त आवश्यकता है। अगर दिन-प्रतिदिन बढ़ती फिजूलखर्ची को नहीं रोका गया तो यह अन्धानुकरण हमें पतन के गर्त में धकेल देगा। कुछ मुख्य बिन्दुओं की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगी।
प्री वेडिंग शूट
हमारे भारतीय समाज में शादी से पूर्व इस तरह के फोटो शूट और लड़के-लड़कियों का खुलेआम प्रेम प्रदर्शन बिल्कुल भी मान्य नहीं कहा जा सकता लेकिन पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण करके युवा पीढ़ी अपने आपको मॉडर्न कहलाने का कोई मौका खोना नहीं चाहती। अगर एक अविवाहित जोड़े ने हिल स्टेशन पर प्री वेडिंग शूट करवाया है तो दूसरा बिकनी में नजर आ रहा है। और तो और उसे बड़ी बेशर्मी से शादी के समय बड़े पर्दे पर बड़े-बुजुर्गों और बच्चों के सामने प्रदर्शित करके नैतिकता की सारी सीमाओं को लांघा जा रहा है।
डेस्टिनेशन वेडिंग
आजकल शादी पारिवारिक उत्सव न होकर महज़ दिखावा बन गया है। घरेलू शादियों की जगह अब डेस्टिनेशन वेडिंग ने ले ली है और यह एक फैशन बनता जा रहा है। अपनी मनपसंद जगह पर जाकर शादी करना, वहां पर करोड़ों रुपए खर्च करके होटल या रिज़ॉर्ट बुक करना और अपने बराबर की हैसियत वाले गिने-चुने रिश्तेदारों को ही आमंत्रित करना अपनी शान समझा जाता है। अमीर लोगों के लिए तो ऐसा करना कोई मुश्किल काम नहीं लेकिन आजकल मध्यम वर्गीय परिवार भी उनकी देखा-देखी में अपने ख़ून पसीने की कमाई को बर्बाद कर रहे हैं, जो सिवाय फिजूलखर्ची के और कुछ नहीं है। इस देखा-देखी में कितने परिवार ज़िन्दगी भर के लिए क़र्ज़ के बोझ तले दब जाते हैं, जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।
डेकोरेशन यानि साज-सज्जा

अब शादी के लिए हर रस्म के लिए अलग-अलग जगह का चुनाव और थीम का चुनाव एक शगल बन गया है। शगुन के काम अब दिखावे के लिए होने लगे हैं। हल्दी, मेंहदी, मायरा और वरमाला से लेकर शादी के मंडप तक सजावट के लिए करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए जाते हैं।
पोशाकों और ज्वेलरी पर खर्च
आजकल शादियों में प्रत्येक थीम के लिए अलग-अलग रंगों की पोशाक रखी जाती है। अगर आपके पास साड़ियों या ड्रेसेज का खज़ाना है भी तो वह बेकार है। क्योंकि थीम के अनुसार आपको नये वस्त्र खरीदने ही पड़ेंगे, नहीं तो आप आउट डेटेड कहलायेंगे। फिर सोशल मीडिया पर शादी की फोटोज़ पोस्ट भी करनी रहती है।
एक बार जो ड्रेस पोस्ट कर दी, वह दुबारा पहनना तो शान के खिलाफ समझा जाता है। मिसेज खन्ना ने एक लाख की ड्रेस बनवाई है तो हम क्यों पीछे रहें? मिसेज वर्मा तो हमेशा ही ड्रेस की मैचिंग ज्वेलरी पहनती हैं। तो फिर फैशनेबल ज्वेलरी, स्मार्टवॉच, मेकअप का सामान और मैचिंग सैंडिल भी तो होने चाहिए।
और तो और आजकल पुरुषों में भी ड्रेसिंग सेंस को लेकर होड़ लगने लगी है। पहले उनके लिए सिर्फ सीमित विकल्प थे लेकिन आजकल तो पति-पत्नी शादियों के अलग-अलग इवेंट में एक ही रंग की ड्रेस पहनने लगे हैं। पहले पुरुषों के लिए पैंट-शर्ट और सूट ही पोशाक के रूप में प्रचलित थे लेकिन अब तो विभिन्न प्रकार के रेडीमेड कुर्ते-पायजामे, धोती-कुर्ता और शेरवानी सभी बाजार में उपलब्ध हैं। तथा उनकी मैचिंग के जूते और मोजड़ी वगैरह भी बाजार में मिलते हैं। एक शादी में भागीदारी के लिए खरीददारी करने में अच्छी खासी जेब हल्की हो जाती है।
मेंहदी डिजाइनर और पार्लर खर्च
पहले की शादियों में परिवार की महिलाएं ही एक-दूसरे को मेंहदी लगाती थी लेकिन आजकल उसके लिए मेंहदी लगाने वालों को किराए पर बुलाया जाता है और उन्हें मुंहमांगी रकम दी जाती है। उसके अलावा परिवार की महिलाओं और दुल्हन के साज-शृंगार हेतु ब्यूटी पार्लर की सेवाएं लेना अनिवार्य हो गया है। आजकल पुरुषों में भी धीरे-धीरे यह संक्रामक बीमारी फैलने लगी है। निश्चित रूप से ये सब आपके बजट को बढ़ाने वाले कारक हैं।

भोजन की बर्बादी
शादियों में बढ़ती फिजूलखर्ची से जुड़ा हुआ एक और महत्वपूर्ण कारक है- व्यंजनों की असीमित संख्या और भोजन के दौरान होने वाली अन्न की बर्बादी। पहले जहाँ केवल भारतीय व्यंजन ही हमारी थाली की शोभा बढ़ाते थे, अब उनकी जगह कांटिनेंटल डिशेज ने ले ली है। अब अगर भारतीय शादी में चाइनीज, मेक्सिकन, इटालियन और थाई व्यंजन न हो तो वह शादी मामूली मानी जाती है। जिसने जितना ज्यादा खर्च किया और जितने ज्यादा व्यञ्जन खाने में परोसे, उसे उतनी ही वाहवाही मिलती है।
मेन कोर्स से पहले चाट के नाम पर उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय व्यंजनों के साथ तमाम महाद्वीपीय व्यंजनों की लाइन लगी रहती है। अब पेट तो बेचारा एक ही है लेकिन जीभ सभी व्यंजनों का स्वाद चखने को लालायित रहती है और इसी कारण प्रत्येक काउंटर पर लम्बी लाइन देखी जा सकती है। ऐसा लगता है कि वहां पर खड़ा प्रत्येक व्यक्ति जन्मों से भूखा हो और एक-दूसरे से पहले प्लेट में डिश झपटने के लिए चील-कौए जैसी छीना झपटी पर उतारू। अब पेट तो पेट है, एक ही समय में बेचारा कितना ठूंसेगा? लिहाज़ा दो कौर लेने के बाद प्लेट डस्टबिन के हवाले कर दी जाती है।
नतीजा यह होता है कि जहां पर जूठी प्लेटें रखी जाती हैं, वहां पर आधे जूठे खाने का ढेर लग जाता है और वह किसी के काम नहीं आता है। आज़ जहां पूरे विश्व में आबादी का एक बड़ा भाग भुखमरी और कुपोषण से पीड़ित है, वहां पर हम लोग कितने अन्न की बर्बादी करते हैं। अगर वही अन्न किसी भूखे के पेट में जाता है तो उसकी आत्मा उस भोजन से तृप्त होगी। इसलिए अपनी प्लेट में जूठा छोड़ने से पहले एक बार इस बारे में अवश्य सोचें और अन्न की बर्बादी न करें। साथ ही साथ केवल दिखावे के लिए शादियों में की जाने वाली फिजूलखर्ची से बचें।
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