मालिक से बात मत छुपाना (बंगाल की लोककथा)

गरिया हाट के पास नंदूराय अकेला रहता था। गांववालों ने मिलकर उसे कुछ रुपये देकर उसका ब्याह करवा दिया। उसकी पत्नी आरती रोज देखती नंदूराय की नौकरी भी नहीं। घर में अनाज नहीं… वह सारा दिन यों ही बैठा रहता है तो उसने सोचा नंदूराय को कहीं किसी के पास काम पर लगा दे। वह उससे बोली, “आप कहीं से कुछ ज्ञान की बातें सीख लो और फिर कहीं-न-कहीं काम मिल जाएगा।”

इन्दु सिन्हा “इन्दु”
अरावली अपार्टमेन्ट, अजन्ता टॉकीज रोड
रतलाम, मध्यप्रदेश

नंदूराय को समझ नहीं आया, ज्ञान की बातें कहां से मिलेंगी? उसने अपने पड़ोस की बूढ़ी दादी से पूछा तो दादी हंस पड़ी, बोली, “ज्ञान की बातें दस-दस रुपये में मिलती हैं। मेरे पास भी हैं उन्हें पल्ले में बांधकर ले जाना। पर, रुपयों के बिना नहीं दूंगी समझे। नंदू फिर पत्नी के पास गया, पत्नी ने तीस रुपये देते हुए कहा, “तीन बाते ले आओजी।”

नंदूराय दादी के पास गया तो उसने पहली बात कही, “जिसे चार जने कह दे वही बात मानने योग्य होती है।” यह ले इसे पल्ले से गांठ बांधकर रख ले… और ला दस रुपये।” नंदू दस रुपये देते हुए पूछना चाहता था यह चार जने कौन से हैं भला? पर उसने पूछा नहीं। दादी ने उसके पास दस के और दो नोट देखे तो बोली बस, “दो बातें और बताऊंगी पहले रुपये दे दे।”

नंदू ने रुपये दिये तो दादी बोली, “कहीं धन मिल जाए तो चुपचाप लेकर चले जाना चाहिए, शोर नहीं मचाना।”

और तीसरी बात अपनी स्त्री से भले बात छुपा लो लेकिन अपने मालिक से कभी बात नहीं छुपाना……  नंदू अब बातों को गांठ बांधकर ले चला।

रास्ते में उसे तीन आदमी मिले… फिर एक और आ गया। चारों ने उसे कहा, “सड़क के किनारे जो भिखारी मरा हुआ है। उसको उसकी गुदड़ी के साथ ही बाहर फेंक दो। नंदू ने देखा चार व्यक्ति ही उसे कह रहे हैं अतः उसने भिखारी को और उसकी गुदड़ी को बाहर फेंका। वह जाने ही लगा था कि सामने गुदड़ी पर नजर पड़ी। उसमें सोने के सिक्के और ढेरों रुपये थे। नंदू रुपये और सोने के सिक्के चुपचाप अपने पास रख लिये और घर जा पहुंचा।

       उसका जी चाहा, पत्नी को सब कुछ बता दे पर उसका ध्यान दूसरी गांठ में बंधी ज्ञान की बात पर गया… “स्त्री से मत कहो पर मालिक से कोई बात नहीं छुपाना।” अब नंदू हर रोज पत्नी को पांच रुपये देता ताकि वह घर का सामान खरीद सके। घर की हालत अब ठीक होने लगी थी और नंदू की पत्नी भी बहुत खुश रहने लगी।

यह देखकर  पड़ोसिन ने पूछ ही लिया नंदू को इतने रुपये कहां से आते हैं। नंदू की पत्नी ने तब पति से पूछ ही लिया तो वह एकदम बोला, “मैं हरड़, बहेड़ा, आंवला पीसकर उसे  फांक लेता हूं….. फिर लोगों को इसके गुण बताता हूं… और वे मुझे खुशी से दस रुपये दे देते हैं।”

नंदू की पत्नी ने पड़ोसन को यही बात बता दी। अगले दिन पड़ोसी भी खूब सारा हरड़, बहेड़ा, आंवला पीसकर फांक गया पर उसकी अपनी हालत खराब होने लगी। अब तो नंदू भी घबरा गया। पड़ोसी मुखिया का साला था। मुखिया उसे देखने आया तो उसने नंदू को बुला भेजा।

तभी नंदू को तीसरी ज्ञान की बात याद आ गयी कि राजा या मुखिया से कुछ न छुपाओ। अब उसने मुखिया को ज्ञान की सारी बातें बताते हुए अपनी सारी घटनाएं बता दीं। मुखिया उससे इतना प्रभावित हुआ कि उसने भी वह सारी बातें गांठ बांध लीं और नंदू को अपने पास ही मुख्य कार्यकर्ता के पद पर लगा लिया। अब उसके दुःख के दिन कट गये थे।

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