भारत एक ऐसा देश है जिसमें विश्व में सबसे पुरानी संस्कृति की नींव है। जहाँ कन्या पूजन होता है। वहीं भ्रूण हत्याएँ भी होती हैं। यहाँ नारी की पूजा भी होती हैं और नारियों का अपमान भी होता हैं। भगवान श्री राम अपने पिताजी की आज्ञा का पालन करने के लिए हंसते हुए वनवास चले गए थे। साथ में लक्ष्मण जी और सीता मैया भी गये थे।

हैदराबाद तेलंगाना
श्रवण कुमार की कथा में, श्रवण कुमार के माता-पिता अंध थे। श्रवण कुमार काँवड़ में बिठाकर, और वह काँवड़ खुद उठाकर भारत के तीर्थ स्थलों की यात्रा कराता था। एक बार वह नदी से पानी भर रहा था, तब अयोध्या के राजकुमार दशरथ ने गलती से कोई वन्य पशु समझ कर उसे शब्दवेधी बाण मार दिया। श्रवण कुमार ने अपनी अंतिम इच्छा अपने माता-पिता की चिंता व्यक्त करते हुए उन तक पानी पहुंचाना बताया। दशरथ ने ठीक ऐसा ही किया। श्रवण कुमार के पिता ने राजकुमार दशरथ को भी पुत्र वियोग मरने का शाप दे दिया।
राम वनवास और श्रवण कुमार चरित्र दोनों में पितृप्रेम है। अभी कलियुग का प्रभाव है। अभी कुछ घरो में बड़े बुजुर्गों का मान नहीं संभाला जाता है। उनकी अवहेलना होती रहती है। इसलिए हमारे देश में मजबूरन वृद्धाश्रम खोलने पड़ते हैं।
हमारे देश में पहले कहा जाता था कि जहां-जहां नारियों की पूजा होती हैं वहां वहां देवों का निवास होता है। अभी नारियों का सम्मान भी नहीं संभाला जाता है।
एक ओर हमारा देश चारों ओर अपने विकास यात्रा की ध्वजा पताका लहरा रहा है। दूसरी ओर पश्चिमी संस्कृति हावी होने लगी हैं। बड़े परिवारों की सोच खतम होने लगी हैं। किसी-किसी संस्कारी घरों में वृद्धों को आदर-सत्कार भी मिलता है। किंतु आजकल पति-पत्नी दोनों को जॉब करना पड़ता हैं। फिर घर के वृद्ध अकेले पड़ जातें हैं। एक तरह से वृद्धाश्रम में उन लोगों को अपने समवयस्क मिलते हैं। अब एक नया विचार आया है। बच्चें अपनी स्कूलों में जातें हैं, ठीक उसी तरह वृद्धों अपने समवयस्कों के केंद्र में जाते हैं। फिर शाम के समय वे लोग अपने अपने घरों में परत वापस आ जाते हैं। इस तरह वृद्धत्व सम्मानित रख कर वे लोग अपना सम्मान संभाल सकतें हैं।

वृद्धाश्रम एक तरह से हमारे देश के नाम पर एक काला धब्बा है। पर क्या करें सभी को कुछ ना कुछ मजबूरियाँ रहती हैं। इस दृष्टिकोण से यह अच्छा भी है यहाँ वृद्ध लोगों को समान उम्र, समान विचार और समान मनोभाव वाले लोग मिलते हैं। पहले के जमाने में तो वे लोग स्वयं ही वानप्रस्थ आश्रम स्वीकार लेतें थे। पर अब उन्हें विवश होकर यह करना पड़ता है।
इस स्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार रहते हुए वृद्धावस्था आने से पहले व्यक्ति को अपने अपने समवयस्कों के साथ संपर्क बढाने का प्रयास करना चाहिये। महिने में कम से कम एक बार तो भी अपने जानने वालों से फोन पर बात करनी ही चाहिए। एक दूसरे का हालचाल जानते रहते रहेंगे तो अच्छा है। समान शौक वाले लोगों से भी संपर्क बढायें रखना चाहिए। उदाहरणत: किताबें पढ़ने का शौक, घूमने-फिरने का शौक, संगीत, चित्रकला या अन्य ललित कला आदि में एक समान अभिरुचि रखने वाले लोगों आपस में एक-दूसरे के संपर्क में रह सकते हैं। और इस तरह से वृद्धावस्था सुखद बना सकते हैं।
आपसी तालमेल से अपनी वृद्धावस्था सुधार सकते हैं। वृद्धाश्रम की जरूरत जितनी कम हो उतना अच्छा है, किंतु यदि जहां इसकी जरूरत है, और वृद्धाश्रम चल रहे हैं, वहाँ समाज के सभ्य लोगों को भी अपना-अपना दायित्व समझकर यथाशक्ति तन-मन-धन से उनका अपना सहयोग करना चाहिए।
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