अभिमान क्यों? किसलिए? किसका?

यह संसार नश्वर है अतः यहाँ किसी का कुछ नहीं यानि अपना होता हुआ भी, कुछ भी अपना नहीं होता, तो फिर सवाल उठता है, अभिमान क्यों?

हालाँकि अभिमान से शायद ही कोई बचा हो यानि हर वर्ग में, हर क्षेत्र में, हर उम्र वालों में सभी जगह यह विषाणु [वायरस] मौजूद मिलेगा। जबकि हम सभी यह जानते भी हैं, और मानते भी हैं कि अभिमान करना बेकार है फिर भी करते तो हैं ही। अतः सवाल यह है कि किसलिए?

गोवर्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’
बीकानेर/मुम्बई 

कुछ रुपये दान करने वाला यदि यह कहे कि उसने ऐसा किया है, तो उससे बड़ा मुर्ख और कोई नहीं और ऐसे भी हैं। जो हर महीने लाखों का दान करते हैं, लेकिन उसका जिक्र तक नहीं करते, न करने देते हैं। वास्तव में जरूरतमंद और पीड़ित की सहायता ही दान है, पुण्य है। ऐसे व्यक्ति पर सरस्वती की सदा कृपा होती है।

इसी सिलसिले में मुझे मेरे स्वयं से जुड़ी एक घटना याद आ गयी। जब मेरे चार्टर्ड एकाउन्टेंट ने बातों के सिलसिले के बीच टोककर कहा कि अंकल “यह हाथ दे तो उस हाथ को भी पता न चले” तभी दिया हुआ सार्थक होता है। मैं निरुत्तर था क्योंकि उन्होंने मेरी बात पर ही कहा था यानि मैं उपरोक्त तथ्य को जानते हुए भी अभिमानी वाली बात की।

हालाँकि आप सभी पाठक जानते होंगे कि देवता भी इससे बचे हुए नहीं हैं। यानि देवताओं तक को अभिमान हो जाता है और उनके अभिमान को दूर करने के लिए परमात्मा को ही कुछ न कुछ उपाय तो करना ही पड़ता है।

अब इसी सन्दर्भ मे एक रोचक कथा है। एक बार  गरुड़, सुदर्शनचक्र तथा सत्यभामा को भी अभिमान हो गया। प्रभु श्रीकृष्ण ने उनके अभिमान को दूर करने के लिए श्री हनुमानजी की सहायता ली।      

प्रभु श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को स्वर्ग से पारिजात लाकर दिया था और वह इसीलिए अपने आपको प्रभु श्रीकृष्ण की अत्यंत प्रिया और अति सुन्दरी मानने लगी थी।

सुदर्शन चक्र को यह अभिमान हो गया था कि   उसने इंद्र के वज्र को निष्क्रिय किया था। वह लोकालोक के अंधकार को दूर कर सकता है। इन्हीं कारणों से प्रभु श्रीकृष्ण उसकी ही सहायता लेते हैं।

गरुड़ प्रभु श्रीकृष्ण का वाहन था। वह समझता था।  भगवान मेरे बिना कहीं जा ही नहीं सकते क्योंकि उसकी गति का कोई मुकाबला नहीं कर सकता।

सर्वशक्तिमान प्रभु अपने भक्तों का सदा कल्याण करते हैं। इसलिए उन्होंने श्री हनुमानजी का स्मरण किया। तत्काल श्री हनुमानजी द्वारिका आ गये और जान भी गये कि प्रभु श्रीकृष्ण ने क्यों बुलाया है? क्योंकि वह यह जानते थे कि प्रभु श्रीकृष्ण और प्रभु श्रीराम दोनों एक ही हैं। इसीलिए सीधे राजदरबार नहीं गये बल्कि कुछ कौतुक करने के लिए उद्यान में चले गए। वृक्षों पर लगे फलों को तोड़ने लगे, कुछ खाए, कुछ फेंक दिए, वृक्षों को उखाड़ फेंका, कुछ को तो तोड़ भी डाला… बाग वीरान बना दिया।

फल तोड़ना और फेंक देना, श्री हनुमानजी का मकसद नहीं था… वह तो प्रभु श्रीकृष्ण के संकेत से कौतुक कर रहे थे… बात प्रभु श्रीकृष्ण तक पहुँची, किसी वानर ने राजोद्यान को उजाड़ दिया है… कुछ किया जाय।

प्रभु श्रीकृष्ण ने गरुड़ को बुलाया और “कहा, “जाओ, सेना ले जाओ। उस वानर को पकड़कर लाओ।”   

गरुड़ ने कहा- “प्रभु, एक मामूली वानर को पकड़ने के लिए सेना की क्या जरूरत है? मैं अकेला ही उसे मजा चखा दूँगा।”

प्रभु श्रीकृष्ण मन ही मन मुस्करा दिए… “जैसा तुम चाहो, लेकिन उसे रोको, जाकर…”

वैनतेय गए- श्री हनुमानजी को ललकारा और पूछा-

“बाग क्यों उजाड़ रहे हो?” “फल क्यों तोड़ रहे हो?”

चलो, तुम्हें प्रभु श्रीकृष्ण बुला रहे हैं। 

श्री हनुमान जी ने कहा, “मैं किसी प्रभु श्रीकृष्ण को नहीं जानता। मैं तो प्रभु श्रीराम का सेवक हूँ। जाओ, कह दो, मैं नहीं आऊँगा।”    

गरुड़ क्रोधित होकर बोला, “तुम नहीं चलोगे तो मैं तुम्हें पकड़कर ले जाऊँगा।”

श्री हनुमानजी ने कोई उत्तर नहीं दिया… गरुड़ की अनदेखी कर वह फल तोड़ते रहे। गरुड़ को समझाया भी- “वानर का काम फल तोड़ना और फेंकना है, मैं अपने स्वभाव के अनुसार ही कर रहा हूँ। मेरे काम में दखल न दो, क्यों झगड़ा मोल लेते हो, जाओ… मुझे आराम से फल खाने दो।” 

गरुड़ नहीं माना… तब श्री हनुमानजी ने अपनी पूंछ बढ़ाई और गरुड़ को दबोच लिया। उसका घमण्ड दूर करने के लिए कभी पूंछ को ढीला कर देते, गरुड़ कुछ सांस लेता, और जब कसते तो गरुड़ के मानो प्राण ही निकल रहे हो… श्री हनुमानजी ने सोचा… भगवान का वाहन है, प्रहार भी नहीं कर सकता। लेकिन इसे सबक तो सिखाना ही होगा। पूंछ को एक झटका दिया और गरुड़ को दूर समुद्र में फेंक दिया।

बड़ी मुश्किल से वहाँ से गरुड़ दरबार में पहुँचे। प्रभु श्रीकृष्ण को बताया कि वह कोई साधारण वानर नहीं है… मैं उसे पकड़कर नहीं ला सकता। 

प्रभु मुस्करा दिए। सोचा गरुड़ का घमण्ड तो दूर हो गया… लेकिन अभी इसके वेग के घमण्ड को भी चूर करना है।   

प्रभु श्रीकृष्ण ने कहा, “गरुड़, श्री हनुमानजी प्रभु श्रीराम जी के भक्त है, इसीलिए नहीं आया। यदि तुम कहते कि प्रभु श्रीराम ने बुलाया है, तो फौरन भागे चले आते। श्री हनुमानजी अब मलय पर्वत पर चले गए हैं। तुम तेजी से जाओ और उससे कहना, प्रभु श्रीराम ने उन्हें बुलाया है। तुम तेज उड़ सकते हो… तुम्हारी गति बहुत है, उसे साथ ही ले आना।”

गरुड़ वेग से उड़े, मलय पर्वत पर पहुँचे। श्री हनुमानजी  से क्षमा माँग, जैसा समझाया वैसा संदेशा दिया… प्रभु श्रीराम ने आपको याद किया है। अभी आओ मेरे साथ, मैं तुम्हें अपनी पीठ पर बिठाकर मिनटों में द्वारिका ले चलता हूँ, तुम खुद चलोगे तो देर हो जाएगी। मेरी गति बहुत तेज है… तुम मुकाबला नहीं कर सकते। 

श्री हनुमानजी मुस्कराए… प्रभु की लीला समझ में आ गयी।

कहा, “तुम जाओ, मैं तुम्हारे पीछे ही आ रहा हूँ।”    

प्रभु श्रीकृष्ण प्रभु श्रीराम का रूप धारण कर सत्यभामा को माता सीता बना सिंहासन पर बैठ गए… सुदर्शन चक्र को आदेश दिया… द्वार पर रहना… कोई बिना आज्ञा अन्दर न आने पाए…

प्रभु श्रीकृष्ण को तो ज्ञात था कि प्रभु श्रीराम का सन्देश सुनकर तो श्री हनुमानजी एक पल भी रुक नहीं सकते… अभी आते ही होंगे। गरुड़ को तो श्री हनुमानजी ने विदा कर दिया और स्वयं उससे भी तीव्र गति से उड़कर गरुड़ से पहले ही द्वारका पहुँच गए। दरबार के द्वार पर सुदर्शन ने उन्हें रोक कर कहा, “बिना आज्ञा अन्दर जाने की मनाही है।”

जब प्रभु श्रीराम बुला रहे हों तो श्री हनुमानजी विलम्ब सहन नहीं कर सकते… सुदर्शन को पकड़ा और मुँह में दबा लिया। अन्दर गए। सिंहासन पर प्रभु श्रीराम और माता सीता जी बैठे थे… श्री हनुमानजी समझ गए… प्रभु श्रीराम को प्रणाम किया और कहा, “प्रभु, आने में देर तो नहीं हुई?” साथ ही कहा, “प्रभु माँ कहाँ है? आपके पास आज यह कौन-सी दासी बैठी है?

सत्यभामा ने सुना तो लज्जित हुई, क्योंकि वह समझती थी कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पारिजात लाकर दिए जाने से वह सबसे सुन्दर स्त्री बन गई है… सत्यभामा का घमण्ड चूर हो गया।   

उसी समय गरुड़ तेज गति से उड़ने के कारण हाँफते हुए दरबार में पहुँचे … सांस फूल रही थी, थके हुए से भी लग रहे थे… और श्री हनुमानजी को दरबार में हाजिर देखकर तो वह चकित हो गये। मन में सोचा ये मेरी गति से भी तेज गति से पहुँच दरबार में हाजिर हो गये? लज्जा से पानी-पानी हो गये। गरुड़ के बल का और तेज गति से उड़ने का घमण्ड चूर हो गया।  

प्रभु श्रीराम ने पूछा, “हनुमान! तुम अन्दर कैसे आ गए? किसी ने रोका नहीं?”    

“रोका था भगवन, सुदर्शन ने… मैंने सोचा आपके दर्शनों में विलम्ब होगा… इसलिए उनसे उलझा नहीं, उसे मैंने अपने मुँह में दबा लिया था।” और यह कहकर श्री हनुमानजी ने मुँह से सुदर्शन चक्र को निकालकर प्रभु के चरणों में डाल दिया।

तीनों के घमण्ड चूर हो गयै। प्रभु श्रीकृष्ण यही चाहते थे। प्रभु श्रीकृष्ण ने श्री हनुमानजी को गले लगाया, हृदय से हृदय की बात हुई… और उन्हें विदा कर दिया। 

इस कथा से यह स्पष्ट है कि परमात्मा अपने भक्तों में, अपने निकटस्थों में अभिमान रहने नहीं देते। प्रभु श्रीकृष्ण सत्यभामा, गरुड़ और सुदर्शन चक्र का घमण्ड दूर न करते तो परमात्मा के निकट रह नहीं सकते थे… और परमात्मा के निकट रह ही वह सकता है जो ‘मैं’ और ‘मेरी’ से रहित हो। परमात्मा (प्रभु श्रीराम हों या प्रभु श्रीकृष्ण) से जुड़े व्यक्ति में कभी अभिमान हो ही नहीं सकता… न प्रभु श्रीराम में अभिमान था, न उनके भक्त श्री हनुमानजी में, न प्रभु श्रीराम ने कहा कि मैंने किया है और न श्री हनुमानजी ने ही कहा कि मैंने किया है… इसलिए दोनों एक हो गए… न अलग थे, न अलग रहे।

अन्त में निवेदन इतना ही है कि हमें उपरोक्त को ध्यान में रख अभी से अभिमान रहित होने का प्रयास तो प्रारम्भ करना ही चाहिये। जितनी सफलता मिलेगी उतना तो लाभ होगा ही। इसी तत्व को सन्त कबीर दास जी ने निम्न दोहे से समझाया था-

मैं मेरा घर जालिया, लिया पलीता हाथ।

जो घर जारो आपना, चलो हमारे साथ।।

(भावार्थ: संसार-शरीर में जो मैं-मेरापन की अहमता-ममता हो रही है, ज्ञान की आग-बत्ती हाथ में लेकर इस घर को जला डालो। अपना अहंकार घर को जला डालता है।)

*****

7 thoughts on “अभिमान क्यों? किसलिए? किसका?”

  1. If you’re into Teen Patti, TeenPattiBlue looks to have got you covered. User interface is intuitive and clean, loads fast. Check it out and tell me what you think! Definitely worth a look if you want to play. Try teenpattiblue for your next Teen Patti session!

  2. Yo, qq88app! Just tried it out, pretty slick. Found some cool games and the navigation wasn’t a headache. Def worth checking out if you’re looking for something new. Check it out here: qq88app

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top