आत्मकथ्य: प्रस्तुत लोककथा प्रसिद्ध गुजराती लोककथाकार झवेरचंद जी मेघाणी जी के लोककथा संग्रह में से ली है। इसके लिए मैंने उनके पौत्र पिनाकिन भाई मेघाणी जी अनुमति ली है)
एक चोर था। उसने एक नियम बना रखा था कि वह साल में केवल एक ही बार चोरी करेगा। एक बार वह एक जंगल के रास्ते से जा रहा था। रास्ते में उसे एक बनिया मिला। बनिया उसे पहचान गया। बनिया पानी पी रहा था। तो आधा पानी डर के मारे छोड़ देने वाला था। चोर ने कहा, “डरो मत! मैं तुम्हें नहीं लूटूंगा। मुझे तो बड़ी चोरी करना है। मुझे तुम सिर्फ तुम्हारी लाठी़ दे दो। मुझे बताओ कि मैं बड़ी चोरी करने कहाँ जाऊं?”

हैदराबाद
बनिया ने बताया, “उज्जैन नगर में।” लेकिन उसने चोर को लाठी देने से मना करते हुए कहा, “मैं लाठी़ दे दूंगा तो मुझे चलने में दिक्कत होगी।” चोर ने बनिये से लाठी़ खींच ली और उसके के दो टुकड़े कर दिए। टूटने पर लाठी़ में से चार कीमती रत्न निकले।
चोर ने बनिए को रत्न लौटाते हुए कहा, “मैंने तुम्हें अभय दान दिया था। फिर भी तुमने मेरे साथ झूठ बोला! मेरे नसीब का मुझे मिल जाएगा नगर में।” बनिया निरुत्तर रह गया। चोर ने उससे कहा, “उज्जैन के राजा को कह देना कि मैं चोरी करने आने वाला हूँ।”
बनिये ने चोर का संदेश उज्जैन नरेश महाराज वीर विक्रमादित्य को पहुँच दिया। राजा को लगा कि देखु तो सही यह बता कर चोरी करने वाला चोर वास्तव में कैसा है? राजा विक्रमादित्य ने नगर से पहरा हटा दिया।
राजा ने खुद को चोर के भेष में सजा लिया। चोर के भेष में वह नगर की चौकीदारी करने चौकी करने लगा! राजा ने आधी रात में चोर को देखा। राजा ने चोर को देख कर चोर की तरह ही सिटी बजाया। चोर को लगा कि कोई मेरी ही बिरादरी का है। दोनों मिलें। राजा ने चोर के सामने खुद को चोर बताया।
चोर ने राजा को कहा, “सुना है कि विक्रम राजा के राज्य में तो पक्का बंदोबस्त होता है और यहाँ तो सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं है। राजा ने कहा, “सब कहने की बात है! चलो मैं तुम्हें एक एक घर दिखाता हूँ।”
सबसे पहले वे दोनों एक सेठ के घर चोरी करने गए। जरा-सी आवाज आई तो सेठानी नींद में ही बोली, “कौन हो भाई” चोर बोला, “अरे! मुझे भाई कहा! भाई होकर मैं बहन के घर में चोरी नहीं कर सकता। बहन को तो कुछ भेंट देना चाहिए। उसने अपने हाथ का सोने का गहना उस घर में रख दिया।
राजा ने दूसरा घर दिखाया। वहाँ एक बोरी में से चोर ने शक्कर समझ कर छोटी सी डली खाया। लेकिन वह नमक था। चोर ने कहा “जिस घर का मैंने नमक खाया हो, मैं वहाँ चोरी करके नमकहराम नहीं बनना चाहता। मैं यहाँ चोरी नहीं करूंगा।
राजा ने चोर को तीसरा घर दिखाया। वहाँ उन लोगों को ज्वार मिला। चोर ने कहा, “ज्वार तो शकुन कहलाती है। जहॉं शकुन हुआ उस घर में मैं चोरी नहीं कर सकता।” राजा ने कहा, “अच्छा शकुन हुआ है! चलो राजमहल में जाकर चोरी करते है!” दोनों मिलकर राजमहल में चोरी करने गये।
राजमहल में महारानी जी हिंडोले खाट पर सोयी हुई थी। हिंडोले खाट के चारों पायें सोने से बने हुए थें। उन दोनों ने रानी के खाट के नीचे एक एक कर के गद्दियां रखी। हिंडोले खाट के बराबर ऊंचाई तक जब गद्दियां हो गई, तब खाट के सोने से बने चारों पायें उन्होने चुरा लिया।
चोर राजा को दो सोने के पायें देने लगा, “यह लो तुम्हारे भाग का हिस्सा।” राजा ने मना कर दिया। राजा ने कहा, “ज्यादा मेहनत तो तुने की है।” चोर ने कहा, “चोरी का स्थान तो आप ने बताया है इसलिए इस पर आप का हक है।”
इतने में चिबरी (उल्लू की प्रजाति का रात्रि पक्षी) बोली। चोर शास्त्र में यह भी एक शकुन था। चोर ने राजा को सीधा दंडवत प्रणाम कर लिया। कहने लगा, “धन्य है राजा विक्रमादित्य! आपने राजा होकर चोर की सहायता की। राजा ने कहा ‘अजब चोर’ को भी धन्य है! राजा ने चोर पूछा, “पर तुम को पता कैसे चला कि मैं राजा हूँ?” चोर ने कहा, “मुझे पशु-पक्षियों की भाषा आती है।”
चोर की ईमानदारी और गुणों से खुश हो कर राजा ने ‘अजब चोर’ को अपने राज्य में अच्छी नौकरी पर रख लिया।
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